Friday, 30 October 2015

आस्था का प्रश्न

कात्यायनी की कविताओं के संकलन "राख-अँधेरे की बारिश में" में से उनके द्वारा वर्ष 1993 में लिखी गयी कविता
"आस्था का प्रश्न"
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तर्क नहीं होता
आस्था के प्रश्न पर
आस्था का न्याय से
कोई सम्बन्ध नहीं होता।
आँखें नहीं होतीं आस्था की,
कुछ भी कर सकती है-
सड़कों पर
नाच सकती है डायनों-सी
खप्पर में पीती हुई बच्चों का खून,
विकट रूप धर, बस्तियों को
राख करती
दिल्ली तक जा सकती है,
मच्छर बन मतपेटियों में
समा सकती है,
भीम रूप धर संसद में
प्रवेश पा सकती है।
तर्क को सैकड़ों फुट नीचे
दफ़्न कर सकती है आस्था,
इतिहास की कपाल-क्रिया कर
अपने तथ्य खुद गढ़ सकती है।
आस्था केवल बहुमत का
अधिकार होती है,
आस्था उन्माद की अम्मा होती है,
मतदान-यज्ञ की कृत्या होती है
आस्था।
रहना चाहते हो यदि इस मुल्क में
तो आस्थावान बनो।
महान पूर्वजों के वारिस
महान बनो।
#Socialism

Wednesday, 14 October 2015

Let’s Not Be Fooled By Bernie Sanders

Let’s Not Be Fooled By Bernie Sanders



Good article to expose this crook, who is nothing more than a careerist, opportunist and same time knows well, how to hook Social Romanticists!

Capitalism and its 'senior' imperialism know well whom to select to keep the revolutionaries, progressives, the working class and peasants confused and delay the revolution, which will annihilate their base and pave way for a true Scientific Socialism!

Social Mobility

Social mobility is a myth, specially between the super rich and the middle class or the working class! As far as, a section of workers rising to middle class is concerned, happens during boom period but shrinks during recession periodically!
This, by any chance, does not alter the nature of capitalism, exploitation of working class, peasants or periodical recession, which is happening since 250 years or birth of unemployment, ignorance, superstition and rise of few of political & religious parasites!
That was my comment on this post, ”

China overtakes US, now has world’s largest middle class

Full article: http://timesofindia.indiatimes.com/business/international-business/China-overtakes-US-now-has-worlds-largest-middle-class/articleshow/49342454.cms

Saturday, 3 October 2015

परिवर्तन प्रकृति और समाज का नियम है!

परिवर्तन तो प्रकृति और समाज का नियम है। चीज़ें लगातार बदलती रहती हैं। बदलाव की क्रमि‍क प्रक्रिया लगातार जारी रहती है और बीच-बीच में क्रांतिकारी परिवर्तन की गुणा...त्‍मक छलांगें लगती रहती हैं। कुल मिलाकर बदलाव का रास्‍ता सर्पिल होता है,पर उसमें जगह-जगह तमाम चढ़ाव-उतार और मोड़-घुमाव होते हैं। 

कई-कई बार इतिहास का रथ किसी कठिन चढ़ाई से पीछे की ओर लुढ़क कर दलदली खाई में धँस जाता है। फिर जबतक वह फिर से आगे गतिमान नहीं होता, ऐसा लगता है मानों गति रुक गयी हो, मानो फिर से नयी ऊँचाइयाँ नापना असम्‍भव हो गया हो। ऐसे उलटाव और ठहराव के दि‍नों में लोग बदलाव के बारे में शंकालू हो जाते हैं और भरोसा खो देते हैं। फिर वे यथास्थिति के साथ समझौता करके जीने की कोशिशें करने लगते हैं। गति के नियमों से उनका भरोसा उठ जाता है। वे विज्ञान और तर्कणा की ओर पीठ करके खड़े हो जाते हैं। जैसे ही वे ऐसा करते हैं, उनका मुँह रू‍ढ़ि‍यों और अंधविश्‍वास की ओर हो जाता है।
लोग जब भविष्‍य की ओर पीठ करके खड़े होते हैं तो उनका मुँह अतीत की ओर हो जाता है। जब क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होती है तो पूरे समाज में स्‍वाभाविक तौर पर अतीतोन्‍मुखता, अतीतजीविता, धार्मि‍क रूढ़ि‍यों और अंधविश्‍वासों का बोलबाला हो जाता है। 
ये स्थितियाँ शासक वर्गों के हित में होता है, इसलिए वे इन्‍हें खूब बढ़ावा देते हैं। इन हालात को बदलने के लिए, भगतसिंह के शब्‍दों में कहें तो, इंसानियत के रूह में हरक़त पैदा करने के लिए क्रांति की स्पिरिट को फिर से ताज़ा करने की ज़रूरत होती है।