Friday, 27 April 2018

और कितना शोषण?

"और कितना शोषण होगा?", "जुल्मी एक ना एक दिन थक ही जायेगा", "इंकलाब होगा जब इन्तहा होगा", आदि! साथियों, इस बात से तय नहीं होता कि मालिक का पेट कब भरेगा! वह कभी भी नहीं भरेगा. ड्रैकुला है, जितना ही नर लहू पिएगा, उतना ही उसे और चाहिए!
बल्कि इस बात से कि शोषित जनता कितना विरोध करती है इस शोषण का, कितनी क्षमता रखती है शोषितों को परस्त करने का!
भाजपा सरकार के आने के बाद जनता का शोषण बेतहाशा बढ़ा है, क्यूंकि जनता का कुछ हिस्सा शोषण कर्ताओं के जाल में फंस चुकी है. देश, धर्म, जाति के नाम पर वे उन्हीं चिल्हों और गिद्धों का साथ दे रहे हैं जो इन्तेजार कर रहे हैं कि कब ये "मुर्ख" मरें और वो इनके मांस को नोच नोच कर खाएं और महा भोज का आयोजन करें! मध्यमवर्गीय "सियार" तो हमेशा से ही बड़े पूंजीपतियों का चापलूस रहा है, भले ही बीच बीच में नाराज हो जाता है, जबकि मालिक का डंडा उसपर भी पड़ता है!
हम विभाजित हैं. हमारे पक्ष में जो भी कुछ श्रम कानून थे, तक़रीबन 40-45 ख़त्म कर दिए गए, रोजगार ख़त्म किये जा रहे हैं, किसानों और आदिवासियों के जमीन हड़पने के नियम सरल किये जा हैं, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के आदेश पर आधार कार्ड अनिवार्य बनाये जा रहे हैं, एफडीआई 100% तक लागु किये गए, हमारे व्यक्तिगत डाटा अमेरिकी, नाटो, इसरायली ख़ुफ़िया विभाग सौपें गए, अमेरिकी सैन्य को हमारे सैनिक अड्डों का निरिक्षण करने के अधिकार दिए गए, आदि आदि!
और भी हमारे पीछे क्या किये गए, हमें नहीं मालूम. जीवन दूभर हो गया है. किसानों, मजदूरों, खासकर असंगठित क्षेत्रों में 2 जून की रोटी भी नहीं कमा सकते. बेरोजगारी और गरीबी के डाटा भी अब आने बंद कर दिए गए हैं!
(जी हाँ, यही तो फासीवाद है, पूंजीवाद का बेहद ही सडा गला और अहिंसक रूप है! हमारी एकता के ख़त्म होने और पूंजी के अन्दुरुनी अंतर्द्वन्द के बढ़ने से यह स्थिति पहुंची है. समाधान भी हमारी एकता और क्रन्तिकारी संघर्ष ही है, जब हम फासीवाद ही नहीं, इसकी जननी पूंजीवाद को ही ख़त्म कर दें!)
क्या हम अपने वर्गीय हित को पहचान सकते हैं, जो मालिकों के वर्गीय हितों के विरोध में है. मालिक को ज्यादा से ज्यदा मुनाफा चाहिए, जबकि हमें एक ढंग का रोजगार और जीने का साधन. ये दोनों आपस में शत्रुता पूर्ण सम्बन्ध रखते हैं.
जागो साथियों, अपने मजदूर वर्ग को पहचानो और एक क्रन्तिकारी एकता की तरफ बढ़ो! वैज्ञानिक समाजवाद ही हमारा अगला पड़ाव है. रुकना नहीं है, जबतक की लक्ष्य की प्राप्ति ना हो!
इंकलाब जिंदाबाद!

Friday, 6 April 2018

पूंजीवाद और बेरोजगारी!

मोदी सरकार की छत्रछाया में बड़े आराम से बड़े पूँजीपति वर्ग की मुनाफाखोरी लील चुकी है नौजवानों-मज़दूरों और मेहनतकशों की नौकरियाँ!

R B I की एक हालिया रिपोर्ट के हवाले से यह कहा गया है कि मोदी सरकार के कार्यकल में देश में रोजगार वृद्धि दर यानी एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ रेट 2014-15 में 0.2% और 2015-16 में 0.1% रहा है। इसमें 2017-18 की चर्चा भी होती तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती। हम जानते हैं, आज रोजगार सृजित नहीं, नष्ट किये जा रहे हैं। इसलिये आज रोजगार सृजन की बढ़ी हुई नहीं, घटी है. इस सच्चाई की ज्यादा से ज्यादा चर्चा, इस एक बड़ी सच्चाई को सामने लाने को लेकर होनी चाहिये कि आज रोजगार नष्ट किये जा रहे हैं।
यही नहीं पूरी आधुनिक सभ्यता नष्ट की जा रही है। विनाश का मंज़र हर कहीं दिखता है। खैर.....यह जानकर आैर अधिक आश्चर्य होगा कि 2014-15 और 2015-16 के बारे में इंगित यह घटी हुई रोजगार वृद्धि दर वास्तव में कितनी घटी हुई है। यह 1982 के बाद सबसे ज़्यादा घटी हुई रोजगार वृद्धि दर है! तो ऐसे में नौकरी कहाँ से मिलेगी नौजवानों को!?

पूँजीवाद अब लोगों की जीवन यापन सम्बन्धी पारंपरिक सुरक्षा को भी हमेशा के लिए संकट में डाल चुकी है। यह उसकी मुख्य प्रवृत्ति है जिसका नग्न स्वरूप आज हम मोदी राज में देख रहे हैं। मोदी सरकार इसके लिए धन्यवाद की पात्र है कि इसके खुले पूंजीपरस्त करतूतों ने लाखों-करोड़ों युवाओं को यह सीखने का अवसर दिया है कि पूँजीवाद अधिकतम मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति से लैस किस आदमखोर और राक्षसी व्यवस्था का नाम है। अगर युवा यह सीख और समझ रहे है तो कल इससे लोहा लेने के लिए भी आगे आएंगे यह निश्चित है। अब पूँजीवाद को हटाने और इसकी जगह नयी व्यवस्था के लिए सीधी लड़ाई का वक्त आ चुका है।

आइये, हम उसके आगमन का जमकर स्वागत करें। यह स्वागत एकमात्र इसी तरह हो सकता है कि हम स्वयं इस लड़ाई के हिस्सेदार बनें। इसकी शुरुआत हर गांव, कस्बा, शहर,मोहल्ले से करें। यह लड़ाई हमारी तरफ से हर प्रकार से खुला है, शर्त बस इतनी है कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सबों के लिये सुलभ हो, उपलब्ध हो, इसकी सच मे गारंटी की जाए। अगर इस व्यवस्था में नहीं तो, फिर जिस व्यवस्था में यह सम्भव है हम उसके लिए भी तैयार हैं। और तैयार रहना चाहिए। पूँजीवाद और पूँजीवादी शासन का मूल आदमखोर चरित्र अगर नहीं बदल सकता है, अगर यह समाज की प्रगति और समष्ट मानवजाति की उन्नति में और कोई योगदान नहीं दे सकता है, क्योंकि यह अधिकतम मुनाफाखोरी के लाइलाज क्षय रोग से पीड़ित है, तो इसे मृत्युशैया से उठाकर इसे कब्र में दफनाना ही उचित है।

यह युवाओं और योग्य से योग्य लोगों तक का रोजगार छीन रहा है, गुणवत्तापूर्ण की बात कौन करे सामान्य शिक्षा से वंचित कर रहा है, स्वास्थ्य सेवा को भी भयंकर मुनाफाखोरी के धंधे में बदल दिया है, यह करोड़ों-करोड़ जरूरतमंदों को घर और दो जून की रोटी तक मुहैया कराने में सक्षम नहीं  हो रहा है, तो यह स्पष्ट है कि यह मरनासन्न है, सड़ चुका है, सड़े हुए लाश की तरह बदबूदार दुर्गंध फैला रहा है। इसे नष्ट कर देना और नई व्यवस्था का सृजन करना हमारे युग की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बन चुकी है।

आइये, मज़दूर भाइयों, मेहनतकश साथियों, छात्रों-नौजवानों! हम अपने इस ऐतिहासिक मिशन के लिए कमर कसें।

Tuesday, 3 April 2018

भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडराता आर्थिक मंदी का भूत

नेकई सर्वे के मार्च तक के लिए जारी रिपोर्ट भारत के निर्माण क्षेत्र की दयनीय बरकरार स्थिति की पुष्टि करने वाली साबित हो रही है। Nekkei India Manufacturing Purchasing Manager Index के अनुसार निर्माण क्षेत्र में पिछले 5 महीने में सबसे कम विकास की दर मापी गई। PMI के रेटिंग के अनुसार मार्च में वृद्धि दर 51.0 रहा जो के फरवरी माह के दर 52.1 से 1.1 पॉइंट काम था। निक्केई रेटिंग में 50 से ऊपर निर्माण क्षेत्र में विकास और इससे नीचे संकुचन को दर्शाता है।
जिस प्रकार से निर्माण क्षेत्र में गिरावट आ रही है यह जल्दी ही 50 पॉइंट के नीचे आ सकता है।
भारत के निर्माण क्षेत्र से आ रहे आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि अर्थव्यवस्था का संकट केवल वित्तीय क्षेत्र तक सीमित न रह कर अब हर क्षेत्र में फैलता जा रहा है।
निक्केई PMI और अन्य रेटिंग किस बात का इशारा कर रहे है?
*पहली बात तो यह कि देश की आर्थिक अवस्था दिनों दिन खराब होती जा रही है।
*निर्माण क्षेत्र पिछले वर्षों में ढलान पर है, और यह सिकुड़ता ही जा रहा है।
नोटबन्दी और जी.एस.टी का असर लघु, छोटे और काफी हद तक मध्यम दर्जे के निर्माताओं पर पड़े मार से अभी तक नहीं निकल सका है। इन दो कारण से काफी लागू, छोटे निर्माता ने अपने प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया।
बन्द हुई कंपनियों में काम कर रहे मज़दूर देश में पहले से ही व्याप्त बेरोजगारों की फौज में अच्छी खासी वृद्धि कर दी। और reserve army of labour की बड़ी खेप देश में तैयार हो गयी है।
रोज़गार के कम होते साधन और निर्माण क्षेत्र में लगातार संकट और सिकुड़न अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट और आने वाले मंदी (recession) की ओर इशारा कर रहे हैं।
2008 में वित्तीय मंदी से भारत कुछ हद तक अपने को अछूता बैंक और वित्तीय संस्थानों की सुदृढ़ स्थिति के कारण कर सका था और करीब 8 प्रतिशत के औसत दर से जीडीपी विकास भी रिकॉर्ड किया था।
लेकिन 2018 में हाल बिल्कुल उलटा है।
बैंकों की माली हालत नाज़ुक है। NPA की औसत में दिसंबर 2014 के मुकाबले दिसंबर 2016 में 135 प्रतिशत का उछाल आया है जो आज शायद और ज्यादा हो गया होगा (फिलहाल हमारे पास 2016 के ही आंकड़े उपलब्ध हैं)। 2017 में सरकारी बैंकों के डूबे ऋण (bad loan) का अनुपात उनकी कुल net value का करीब 75 प्रतिशत है। जो खुद में इन बैंकों की पतली हालात की तरफ साफ संकेत है।
देश पर आर्थिक मंदी के बादल मंडरा रहे हैं, मंदी को कितने दिनों तक दूर रखा जा सकता है, इस पर जिन्हें फैसले लेने हैं वे खुद ही चंद पूंजीपतियों को अकूत ऋण देकर देश की जनता को खाई में धकेल रहे हैं।
भगवान और धार्मिक उन्माद का नाम लेना सत्ता में रहने के लिए काफी हो, तब कोई फिर अर्थव्यवस्था की चिंता क्यूं करे?

(साथी दामोदर के फेसबुक के पोस्ट से.)

पूंजीवाद मतलब मूनाफे के लिए उत्पादन. पिचले वर्ष के सारे सामाजिक धन का 73% हिस्सा भारत के कुछ बड़े पूंजीपति हड़प कर ले गए! मतलब जीडीपी, जो भी हो, वह मजदूर वर्ग और किसान के पास नहीं जाता है. ऊपर से पूंजीवादी वर्ग भी इस पूंजीवादी उत्पादन के अन्दुरुनी अंतर्विरोध के कारन विकसित नहीं हो सकता है. यानि उत्पादक शक्तियों का ह्रास! इसी का नतीजा है, भारत में उत्पादन क्षमता का केवल 70% ही इस्तेमाल हो रहा है! अब, केवल एक ही रास्ता है मजदूर वर्ग और किसानों के पास, इस उत्पादन प्रणाली को हटाकर समाजवादी उत्पादन की व्यवस्था लायें. यानि, वह समाज जहाँ उत्पादन के साधन पर उत्पादन करने वालों के अधीन हो, उत्पाद के मालिक भी वही होंगे और वितरण उन्ही के हाथ में होगा!