पूंजीवाद जब अपने जीवन काल पूरा कर लेता है, तब अपने जीवन को दीर्घायु बनाने के लिए पूरी कोशिश करता है. मजदूर वर्ग, जो जरुरी है पूंजीवाद को आगे बढाने के लिए (मुनाफा के जरिये), ही पूंजीवाद का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है. मजदूर ही इसे नेस्तनाबूद कर समाजवादी समाज के निर्माण के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है.
जीवन के अंतिम क्षणों में, पूंजीवाद मजदूर वर्ग, किसान और बाकी सभी शोषित वर्गों के जीवन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं होता है. रोजगार, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि समस्याओं का समाधान पूंजीवाद के पास नहीं है, न ही कोई जवाब है बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराध का.
ऐसे में एक ही रास्ता बचता है पूंजी के चाटुकारों, प्रबंधकों के पास. मजदूर वर्ग की एकता और संघर्ष को तोड़ना, "जिद्दी" नेताओं और समर्थाकों को बलपूर्वक दबाना, उत्पादक शक्तियों को बर्बाद करना.
यहाँ पर पूंजीवादी "प्रजातंत्र" का मुखौड़ा बेकनाब हो जाता है और फिर उसका असली तानाशाही रूप सामने आता है.
इस तानाशाही का एक रूप और है, फासीवाद. यहाँ पर पूंजीवादी सत्ता या सरकार अपने हर विभाग, प्रजातंत्र के हर स्तम्भ को सीधे सीधे अपने हाथ में ले लेती है, जनता के एक हिस्से को पैसे और क्रांति विरोधी विचारधारा, धर्म, जाती, देश आदि के बहकावे में अपने साथ कर लेती है.
इसके लिए उसे ऐसे पार्टी और नेताओं की जरुरत होती है जो सक्षम हों अपने प्रतिगामी विचार, सदस्यों के साथ, पूंजीवाद के इस काम को पूरा कर सकें. ये प्रजातान्त्रिक मूल्यों को हेय दृष्टि से देखते हैं. इसके नेता भाषण देनें में, जनता को बेवकूफ बनाने में, झूठ और मक्कारी में अव्वल होते हैं. हिटलर से लेकर ट्रम्प, युक्रेन के पोरोशेन्को, इस्राइल के नेतान्याहू, पोलैंड के षाशक कुछ उदहारण हैं. वैसे इन्हें बनाने में बुर्जुआ वर्ग की मिडिया, प्रबुद्ध मंडल और पैसे भी भारी मात्र में लगते हैं.
भारत की भी यही हालत है. नतीजा? लेख के अंतिम पैराग्राफ को उदधृत कर रहा हूँ, "लेकिन आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा का कैरियर मोदी और शाह की प्रतिशोधी जोड़ी ने नष्ट कर दिया और मानसी सोनी ने मीटू का मौका हमेशा के लिए खो दिया…. ये लोग कुछ शीर्ष पदों पर कब्जा कर पाए और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया। कैसी विडंबना है।"
आज के हालत के जिम्मेदार केवल पूंजीवाद के अंदरूनी अंतर्द्वंद ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों और वाम पंथियों की चुक या असफलता भी है, चाहे जिस कारन से हो, जहाँ वह मजदूर वर्ग और सहयोगियों के असंतोष और विद्रोह को सफल रास्ता दिखाने और नेत्रित्व देने में असफल रहे हैं!
क्या यह हालत हमेश के लिए है? बिलकुल नहीं, पर खुद बखुद नहीं ख़त्म होगा. हमें क्रन्तिकारी पार्टी के साथ मिलकर संघर्ष करना होगा, वर्ग संघर्ष को मजबूत और तीव्र करना होगा. तभी हमारी जित संभव है और तभी हम समाजवाद की स्थापना कर सकेंगे और परजीवी अपराधियों को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म कर सकेंगे!
https://www.bhadas4media.com/mansi-soni-metoo/#comment-178493
जीवन के अंतिम क्षणों में, पूंजीवाद मजदूर वर्ग, किसान और बाकी सभी शोषित वर्गों के जीवन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं होता है. रोजगार, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि समस्याओं का समाधान पूंजीवाद के पास नहीं है, न ही कोई जवाब है बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराध का.
ऐसे में एक ही रास्ता बचता है पूंजी के चाटुकारों, प्रबंधकों के पास. मजदूर वर्ग की एकता और संघर्ष को तोड़ना, "जिद्दी" नेताओं और समर्थाकों को बलपूर्वक दबाना, उत्पादक शक्तियों को बर्बाद करना.
यहाँ पर पूंजीवादी "प्रजातंत्र" का मुखौड़ा बेकनाब हो जाता है और फिर उसका असली तानाशाही रूप सामने आता है.
इस तानाशाही का एक रूप और है, फासीवाद. यहाँ पर पूंजीवादी सत्ता या सरकार अपने हर विभाग, प्रजातंत्र के हर स्तम्भ को सीधे सीधे अपने हाथ में ले लेती है, जनता के एक हिस्से को पैसे और क्रांति विरोधी विचारधारा, धर्म, जाती, देश आदि के बहकावे में अपने साथ कर लेती है.
इसके लिए उसे ऐसे पार्टी और नेताओं की जरुरत होती है जो सक्षम हों अपने प्रतिगामी विचार, सदस्यों के साथ, पूंजीवाद के इस काम को पूरा कर सकें. ये प्रजातान्त्रिक मूल्यों को हेय दृष्टि से देखते हैं. इसके नेता भाषण देनें में, जनता को बेवकूफ बनाने में, झूठ और मक्कारी में अव्वल होते हैं. हिटलर से लेकर ट्रम्प, युक्रेन के पोरोशेन्को, इस्राइल के नेतान्याहू, पोलैंड के षाशक कुछ उदहारण हैं. वैसे इन्हें बनाने में बुर्जुआ वर्ग की मिडिया, प्रबुद्ध मंडल और पैसे भी भारी मात्र में लगते हैं.
भारत की भी यही हालत है. नतीजा? लेख के अंतिम पैराग्राफ को उदधृत कर रहा हूँ, "लेकिन आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा का कैरियर मोदी और शाह की प्रतिशोधी जोड़ी ने नष्ट कर दिया और मानसी सोनी ने मीटू का मौका हमेशा के लिए खो दिया…. ये लोग कुछ शीर्ष पदों पर कब्जा कर पाए और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया। कैसी विडंबना है।"
आज के हालत के जिम्मेदार केवल पूंजीवाद के अंदरूनी अंतर्द्वंद ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों और वाम पंथियों की चुक या असफलता भी है, चाहे जिस कारन से हो, जहाँ वह मजदूर वर्ग और सहयोगियों के असंतोष और विद्रोह को सफल रास्ता दिखाने और नेत्रित्व देने में असफल रहे हैं!
क्या यह हालत हमेश के लिए है? बिलकुल नहीं, पर खुद बखुद नहीं ख़त्म होगा. हमें क्रन्तिकारी पार्टी के साथ मिलकर संघर्ष करना होगा, वर्ग संघर्ष को मजबूत और तीव्र करना होगा. तभी हमारी जित संभव है और तभी हम समाजवाद की स्थापना कर सकेंगे और परजीवी अपराधियों को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म कर सकेंगे!
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