Friday, 21 December 2018

मानसी सोनी नरेंद्र मोदी के लिए #MeToo लिखने लायक बनने से चूक गईं!

पूंजीवाद जब अपने जीवन काल पूरा कर लेता है, तब अपने जीवन को दीर्घायु बनाने के लिए पूरी कोशिश करता है. मजदूर वर्ग, जो जरुरी है पूंजीवाद को आगे बढाने के लिए (मुनाफा के जरिये), ही पूंजीवाद का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है. मजदूर ही इसे नेस्तनाबूद कर समाजवादी समाज के निर्माण के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है.
जीवन के अंतिम क्षणों में, पूंजीवाद मजदूर वर्ग, किसान और बाकी सभी शोषित वर्गों के जीवन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं होता है. रोजगार, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि समस्याओं का समाधान पूंजीवाद के पास नहीं है, न ही कोई जवाब है बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराध का.
ऐसे में एक ही रास्ता बचता है पूंजी के चाटुकारों, प्रबंधकों के पास. मजदूर वर्ग की एकता और संघर्ष को तोड़ना, "जिद्दी" नेताओं और समर्थाकों को बलपूर्वक दबाना, उत्पादक शक्तियों को बर्बाद करना.
यहाँ पर पूंजीवादी "प्रजातंत्र" का मुखौड़ा बेकनाब हो जाता है और फिर उसका असली तानाशाही रूप सामने आता है.
इस तानाशाही का एक रूप और है, फासीवाद. यहाँ पर पूंजीवादी सत्ता या सरकार अपने हर विभाग, प्रजातंत्र के हर स्तम्भ को सीधे सीधे अपने हाथ में ले लेती है, जनता के एक हिस्से को पैसे और क्रांति विरोधी विचारधारा, धर्म, जाती, देश आदि के बहकावे में अपने साथ कर लेती है.
इसके लिए उसे ऐसे पार्टी और नेताओं की जरुरत होती है जो सक्षम हों अपने प्रतिगामी विचार, सदस्यों के साथ, पूंजीवाद के इस काम को पूरा कर सकें. ये प्रजातान्त्रिक मूल्यों को हेय दृष्टि से देखते हैं. इसके नेता भाषण देनें में, जनता को बेवकूफ बनाने में, झूठ और मक्कारी में अव्वल होते हैं. हिटलर से लेकर ट्रम्प, युक्रेन के पोरोशेन्को, इस्राइल के नेतान्याहू, पोलैंड के षाशक कुछ उदहारण हैं. वैसे इन्हें बनाने में बुर्जुआ वर्ग की मिडिया, प्रबुद्ध मंडल और पैसे भी भारी मात्र में लगते हैं.
भारत की भी यही हालत है. नतीजा? लेख के अंतिम पैराग्राफ को उदधृत कर रहा हूँ, "लेकिन आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा का कैरियर मोदी और शाह की प्रतिशोधी जोड़ी ने नष्ट कर दिया और मानसी सोनी ने मीटू का मौका हमेशा के लिए खो दिया…. ये लोग कुछ शीर्ष पदों पर कब्जा कर पाए और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया। कैसी विडंबना है।"
आज के हालत के जिम्मेदार केवल पूंजीवाद के अंदरूनी अंतर्द्वंद ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों और वाम पंथियों की चुक या असफलता भी है, चाहे जिस कारन से हो, जहाँ वह मजदूर वर्ग और सहयोगियों के असंतोष और विद्रोह को सफल रास्ता दिखाने और नेत्रित्व देने में असफल रहे हैं!
क्या यह हालत हमेश के लिए है? बिलकुल नहीं, पर खुद बखुद नहीं ख़त्म होगा. हमें क्रन्तिकारी पार्टी के साथ मिलकर संघर्ष करना होगा, वर्ग संघर्ष को मजबूत और तीव्र करना होगा. तभी हमारी जित संभव है और तभी हम समाजवाद की स्थापना कर सकेंगे और परजीवी अपराधियों को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म कर सकेंगे!

https://www.bhadas4media.com/mansi-soni-metoo/#comment-178493

Friday, 14 December 2018

मानसिक बीमारी: पूंजीवादी देन!

मानसिक बीमारी पूंजीवाद का उत्पाद है, जो युवाओं, मजदूरों, किसानों को रोजगार, वैज्ञानिक शिक्षा, योग्य आवास और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रखता है. नौकरियों को खोने, अपमानित होने का लगातार डर रहता है! अगला भोजन मिले या न मिले की चिंता है. बुर्जुआ मिडिया का भी रोल है. आत्म हत्या भी इसी बीमारी का अग्रिम रूप है और किसी भी पूंजीवादी देश, भले ही कितना भी "उन्नत" हो, में बहुतायत में दिखता है.
आतंकवाद और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में लोग मानसिक तनाव और बीमारी से अधिक ग्रसित होते हैं। धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय, रंग और लिंग भेद और उत्पीडन इस बीमारी को बढ़ाता है.
इन बीमारों में से कुछ, जो बुर्जुआ संस्थानों, विद्यालयों के उत्पाद हैं, पूंजीवाद का समर्थन करते हैं!
पूंजीवाद का समर्थन करने वाले ये मानसिक दास बुर्जुआ पार्टियों, दक्षिण पंथी विचारधाराओं, धार्मिक और सांस्कृतिक ठगों, पूंजीपती जो उन्हें नौकरियां प्रदान करते हैं, आदि का समर्थन करते हैं, लेकिन समाजवाद का विरोध करते हैं।
पूंजीवाद आज के हर बीमारी, शोषण, प्रतारणा, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, अपराध को जन्म देता है! यह बीमारी आज व्यापक है समाज में, जिसमे से अधिकांश को पता ही नहीं होता, क्यूँ की अब वह सामान्य सा दिखने लगा है!
इनका इलाज केवल और केवल समाजवादी क्रांति है!

Saturday, 8 December 2018

सुधार नहीं क्रांति के लिए संघर्ष करो!

यदि EVM में हेरा फेरी ना हुआ तो भाजपा की हार 5 राज्यों के चुनाव में नजर आ रहा है. यह अरबों-खरबों की लागत, दुष्प्रचार, हिन्दू-मुसलमान कर जनता को बांटने, झूठ और मक्कारी के बावजूद हो रहा है. यदि हार जबरदस्त ना हो, तो भी आरएसएस का गिरता ग्राफ तो साफ़ नजर आ रहा है.
साथियों, पर क्या यह ऐसा बदलाव है, जिसके लिए हम लड़ रहे हैं? कौंग्रेस की वापसी मजदूर वर्ग और किसानों के लिए शुभ संकेत है? क्या दलित, अल्प संख्यक, आदिवासी, महिलाएं अब एक शोषण विहीन समाज में रहने के सपने देखने के अधिकारी हो जायेंगे?
साथियों क्या इस बदलाव से हमें 100% रोजगार मिल जायेगा, गुणवत्ता शिक्षा और स्वस्थ्य सेवा मुहैया होगा, आवास की समस्या का निदान होगा, क्या पुलिस और प्रशाषण के प्रतारानाओं से मुक्त हो जायेंगे, क्या हम एक इंसान की तरह जी सकेंगे?
साथियों, याद रखें, कौंग्रेस और इसके भिन्न सहयोगी दल, जिसमे से कई अब भाजपा के सहयोगी हो गए हैं या पहले थे, बड़े पूंजीपति वर्ग के दलाल हैं और उसी के लिए काम कर रहे हैं. ये सारे हमारे ही नाम लेकर हमें जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर हमें कई खेमों में बाँट दिया है. हमें एक दुसरे से दुश्मनों की तरह लड़वा रहे हैं. जबकि हमारा असली दुश्मन तो पूंजीपति वर्ग और उसके दलाल राजनितिक दल, धर्म और संस्कृति के ठेकेदार और पाखंडी, प्रशाशन और पुलिस के बड़े ऑफिसर हैं. न्यायलय में भी हमारी सुनवाई नहीं है. कानून बदल कर बड़े पूंजीपतियों की सेवा की जाती है और दलाली कमाई जाती है.
साथियों, आज इन बातों को समझना जरुरी है. नहीं तो फिर हम पुराने चक्र में ही फंसे रहेंगे, यानि कौंग्रेस, भाजपा, तीसरा या चौथा मोर्चा करते रहेंगे. और हमारी मुक्ति, हमारा सपना कभी भी पूरा नहीं होगा.
साथियों, हमें ऐसे बदलाव की दरोकार नहीं जो केवल सत्ता बदले, पार्टी बदले, चेहरे बदले, कुछ कानून बदले, हमें कुछ "दान" दे दे, पर मूलतः पूंजीवादी सत्ता को बरक़रार रखे!
साथियों, हमें ऐसा बदलाव चाहिए, जिसमें पूंजीवाद को ही ध्वस्त करे, इसके शोषण और प्रतारण को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करे, जहाँ हर हाथ को काम और हर परजीवी को कारावास हो, जहाँ धर्म और जाति से शासन और विभाजन ना हो. यानी एक समाजवादी समाज हो, जहाँ एक मनुष्य दुसरे मनुष्य का शोषण ना कर सके!
साथियों, सोचने का समय तो ख़त्म हो चूका है, आगे बढ़ो, समाज के ऐसे बदलाव के लिए जो केवल ऊपर से ना हो बल्कि इसके आधार को ही बदल दे, यानि क्रांतिकारी परिवर्तन हो!
इन्कलाब का समय है, सुधार या कुछ मांगो को लेकर संतुष्ट होने का नहीं!

"जब भी कोई परिवर्तन आंतरिक तंत्र को छूता है, तो हमारे पास सुधार होता है; जब भी आंतरिक तंत्र बदल जाता है, तो हमारे पास क्रांति होती है": डैनियल लिओन!