Monday, 10 October 2016

देश का नाम ही अपने नाम पर सऊदी अरब रखा

Mukesh Tyagi
1920 तक इब्न सऊद अरब मरुस्थल का एक छोटा कबीलाई सरदार था, जो बिकने के लिए तैयार था, ईमान जैसी चीज जिसके पास भी न फटकती थी। ब्रिटिश सरकार ने उसको पैसा और हथियार दिए, साथ में TE Lawrence के नेतृत्व में फौजी टुकड़ी; 1922 तक उसे साठ हजार पाउंड सालाना मिलते थे, जिसे चर्चिल ने बढाकर १ लाख पाउंड कराया। चर्चिल ने उसे एक रोल्स रॉयस गाड़ी भी भेंट में दी। चर्चिल की नजर में वह 'असहिष्णु और खून का प्यासा' लेकिन ब्रिटिश वफादार था!। इस मदद से उसने जिस इलाके पर कब्ज़ा किया उस देश का नाम ही अपने  नाम पर सऊदी अरब रखा और वहाँ के पेट्रोलियम उद्योग को ब्रिटिश-अमेरिकी कंपनियों को सौंप दिया। ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवाद का यह भाड़े का टट्टू आज इस्लाम का सरपरस्त है, जबकि ज्यादातर islamist अमेरिका का गालियाँ देते मिलते हैं!
अब अगर ऐसा खानदान यमन में जनाजे पर बम बरसा कर 150 को मार दे, ISIS जैसी तंजीमों की मदद करे, उत्तर अफ्रीका से लेकर पश्चिम-दक्षिण एशिया तक आतंकवादियों की मदद करे तो उसमें अचम्भा क्या? जिसकी पैदाइश ही इस सड़ांध में से हुई हो, जिसकी नजर में वह अपने और अपने आकाओं के स्वार्थों के लिए किस काम को गिरा हुआ समझे?
अचम्भा इस पर भी मत करिये कि ऐसे ही शुरुआत वाले भारत के नए शासक भी आजकल उसी अमेरिकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के दरबार में हाजिरी लगाने में गर्व महसूस करते हैं, साथ में इनके बड़े सलाहकार अजित डोवाल का बेटा, शौर्य डोवाल, जो संघ के बड़े नेता राममाधव के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाता है, जिसके कार्यक्रमों में खुद मोदी जी और उनके मंत्री लोग इकट्ठा होते हैं, वह साथ में एक कंपनी ZeusCorp का भी पार्टनर है। इस कंपनी के मालिक का नाम है His Highness Prince Mishaal bin Abdullah bin Turki bin Abdulaziz Al-Saud - उसी अल सऊद खानदान के वारिसों में से एक, शायद इब्न सऊद का पोता!
थोड़ा ढूंढिये तो पाएंगे कि दुनिया भर के इन सब गिरोहों के तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं - इस्लामी, हिंदुत्ववादी, ईसाईयत वाले, यहूदी जियनवादी - और इन सबके ऊपर वरदहस्त मिलेगा, बड़े साम्राज्यवादी गिरोहों, वित्तीय-औद्योगिक कारोबारियों, हथियार व्यापारियों, मीडिया घरानों, आदि का। ऐसे ही गिरोह विभिन्न देशों की आर्थिक नीतियों के पीछे मिलेंगे और यही सारे तनाव-युद्दोन्माद के माहौल के पीछे, मुनाफा कमाते हुए! बाकी सब राष्ट्रवाद, मजहब परस्ती, आदि सिर्फ जनता को मूर्ख बनाकर लूटते रहने का कारोबार है।
(टिप्पड़ी: समाजवाद ही एकमात्र रास्ता है, जहाँ मनुष्य एक मनुष्य की तरह रहा सकता है! जहाँ शोषण नहीं हो, एक मनुष्य दुसरे मनुष्य को मजदुर नहीं बना सकता है! बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, युद्ध, अन्धविश्वास नहीं हो! आधार क्या होगा इस समाजवाद का? समाज का धन समाज का होगा. व्यक्तिगत पूंजी का खात्मा होगा. उत्पादन समाज के खपत के लिए होगा जरुरत के मुताबिक न की मुनाफे के लिए)

Saturday, 8 October 2016

प्रेमचंद की पुण्‍यतिथि (8 अक्‍टूबर) के अवसर पर उनका लेख - साम्प्रदायिकता और संस्कृति

साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहत है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।
तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।
फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।
खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?
संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।
फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।
इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।
मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।
इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं, ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।
उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।
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‘आह्वान’ ज़िन्दगी के इस दमघोंटू माहौल को बदलने के लिए तमाम ज़िन्दा लोगों का आह्वान करता है। यह उन सभी का आह्वान करता है जो सही मायने में नौजवान हैं। जिनमें व्यक्तिगत स्वार्थ, कायरता, दुनियादारी, धन लिप्सा, कैरियरवाद और पद-ओहदे-हैसियत-मान्यता की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा के ख़िलाफ़ लड़ने का माद्दा और ज़िद है, जिनकी रगों में उष्ण रक्त प्रवाहित हो रहा है। जो न्याय, सौन्दर्य, प्रगति और शौर्य के पुजारी हैं। ‘आह्वान’ जनता की सेवा में लग जाने के लिए, मेहनतकश अवाम में घुलमिलकर उसकी मुक्ति का परचम थाम लेने के लिए ऐसे ही नौजवानों का आह्वान करता है। सामाजिक क्रान्तियों की कठिन शुरुआत की चुनौतियों को स्वीकारने के लिए पहले जनता के बहादुर युवा सपूत ही आगे आते हैं। इतिहास के रथ के पहिए नौजवानों के उष्ण रक्त से लथपथ हुआ करते हैं।http://ahwanmag.com/archives/1259

Sunday, 5 June 2016

Scientific Socialism: हमसफ़र

Scientific Socialism: हमसफ़र

ए हमसफ़र, तू मेरी चिंता ना कर,
सही मंज़िल तो ढूँढ, निकल पड़ रास्ते पर!
पाएगा मुझे खुद ब खुद अपने साथ मे,
रास्ते कई हैं, पर उसी मंजिल में!
शोषण विहीन मानव समाज!

Wednesday, 4 May 2016

कार्ल मार्क्‍स की 198वीं जन्‍मतिथि (5मई, १८१८)

कार्ल मार्क्‍स की 198वीं जन्‍मतिथि(5मई) के अवसर पर
"चूँकि मैं हर प्रकार की व्‍यक्ति-पूजा के विरुद्ध हूँ, इसलिए अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संघ के अस्तित्‍व-काल में उन अनगिनत सन्‍देशों को पब्लिक के सामने जाहिर करने की अनुमति मैंने कभी नहीं दी जो मेरी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए भिन्‍न-भिन्‍न देशों से जबर्दस्‍ती मेरे पास भेजे गये हैं। सिवा इसके कि उनके भेजने वालों को डाँट देने के लिए मैंने कभी कुछ लिख दिया हो, आम तौर से ऐसे संदेशों का मैंने कभी जवाब तक नहीं दिया। कम्‍युनिस्‍टों के अपने प्रथम गुप्‍त संगठन में एंगेल्‍स और मैं इस शर्त पर शामिल हुए थे कि उसके नियमों में से हर उस चीज़ को निकाल दिया जायेगा जिससे सत्‍ता के प्रति अन्‍ध-भक्ति की भावना को बढ़ावा मिल सकता है।"
--कार्ल मार्क्‍स

(डब्‍ल्‍यू. ब्‍लौस के नाम लिखे गये एक पत्र का अंश, 10नवम्‍बर,1877)

Sunday, 10 April 2016

मजहब बनाम वैयक्तिक विचार

मजहब को वैयक्तिक विचार से अधिक महत्व नहीं मिलना चाहिए। देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास की मौके-बे-मौके जिस प्रकार दुहाई दी जाती है, वह भी हमारे कार्य में बाधा डालने वाली है। मनुष्य लाखों बरस के विकास के बाद आज यहाँ पहुँचा है। पहले उसके विकास की गति मंद रही, लेकिन इधर वह तीव्र होती गयी। मनुष्य के इतिहास के किन्हीं भी दो समयों में एक परिस्थिति नहीं रही। हमेशा समस्याएँ नयी उठीं और उनके हल भी नये निकालने पड़े। अपने भूत के प्रति गौरव और आवश्यकता से अधिक अनुराग हमारे लिए बड़ी ख़तरनाक चीज़ है। वह हमारी पुरानी बेवकूफियों के प्रति आदर का भाव पैदा कर देता है। आज जिन सामाजिक और धार्मिक ख़राबियों को हम देख रहे हैं, उनकी जड़ उसी भूत की श्रद्धा में निहित है।
-- राहुल सांकृत्यायन

Friday, 8 April 2016

धार्मिक कट्टरवाद और वैज्ञानिक समाजवाद

बांग्लादेश में विगत तीन वर्षों के भीतर ही नजीमुद्दीन समद के पूर्व फैसल अर्फ़िंन दीपन,निलय नील,अनंत विजय दास,वैसिकुर्र रहमान,अभिजीत रॉय,शफीउल इस्लाम,अहमद रजीब हैदर आदि तर्कवादी नास्तिकों की भी नृशंस हत्या की जा चुकी है।इसी कड़ी में नास्तिक ब्लॉगर आसिफ़ मोहिउद्दीन,सुन्निउर रहमान आदि पर जानलेवा हमला भी हो चुका है।ऐसे सभी कुकर्मों में वैसे इस्लामी कट्टरवादी शामिल रहे हैं जिन जाहिलों को इस्लाम या कुरान पर तर्कवादी दृष्टिकोण से की गई कोई भी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।
ऐसा ही हाल अपने देश भारत में पनसारे,दाभोलकर और कलबर्गी जैसे तर्कवादियों का हुआ है, जिनकी कायराना हत्या का संदेह कट्टर हिंदूवादी तत्वों पर है।इन धर्मविमूढ़ अंधों को भी तर्कवादी इसलिए बर्दाश्त नहीं थे क्योंकि ये हिन्दू धर्म से सम्बंधित अंधविश्वासों का प्रतिरोध करते थे।
ये सभी धार्मिक कट्टरवादी, वैश्विक पैमाने पर प्रगतिशील,वैज्ञानिक और क्रांतिकारी विचारों,वैज्ञानिक समाजवाद,साम्यवाद के कमजोर पड़ते ही इतिहास के कूड़ेदान से अपना घिनौना चेहरा लिए इस कदर प्रकट हो गए हैं जैसे गोबर के ढेर पर कुकुरमुत्ते।लगता है इन मानवविरोधी धार्मिक विक्षिप्तों की अंतिम पराजय के पूर्व अभी मानवजाति के अनेक विद्वान सपूतों को अपनी जान इन जाहिलों के हाथों गंवानी पड़ेगी।समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन संबंधी वैज्ञानिक विचारों के विरुद्ध पूंजीवाद के कुत्सा प्रचार अभियान में धार्मिक कट्टरवादियों से की गई उसकी गलबहियों की बड़ी भारी कीमत मानवजाति को चुकानी पड़ेगी ऐसा प्रतीत होता है।

Wednesday, 6 April 2016

गड्डे से बाहर निकलने के बारे में!

हमारा समय एक ऐसे विशाल, गहरे, अंधकारमय दलदली गड्डे के समान है, जिसमें समाज के संवेदनशील बौद्धिक जन भी धँसे पड़े हैं। इनमें से कुछ बस उन दिनों को याद करके राहत पाने की निष्फल कोशिश कर रहे हैं, जब वे गड्डे के बाहर थे।
कुछ ऐसे हैं जिन्होंने गड्डे के जीवन को अपनी नियति मान लिया है। वे गड्डे के जीवन में ही सार्थकता और सौन्दर्य का संधान कर रहे हैं या फिर इसी गड्डे में किसी बेहतर, सुकूनतलब, सूखे कोने की तलाश को एकमात्र मुक्तिमार्ग बताने लगे हैं।
कुछ हैं जो बाहर की स्वच्छ ताज़ा हवा वाली दुनिया को एक मिथकीय महाख्यान घोषित कर चुके हैं और गड्डे और गड्डे के बाहर की दुनिया के अन्तर को मात्र एक भाषाशास्त्रीय खेल या मनोगत विभ्रम बता रहे हैं। 
कुछ निरुपाय –असहाय आशावादी हैं जो गड्डे में लेटे हुए ऊपर आसमान में छिटके तारों की रोशनी की ओर देखते रहते हैं। लेकिन बहुत थोड़े से ऐसे लोग भी हैं जो गड्डे से बाहर निकलने के बारे में आश्वस्त हैं और इसके लिए भिड़ायी जाने वाली जुगतों के बारे में लगातार बातें भी कर रहे हैं।
कविता कृष्णपल्लवी

Thursday, 31 March 2016

राजनीति और राजनैतिक दलाली मे फ़र्क

Padam Kumar
राजनीति (politics) और राजनैतिक दलाली (political agency) मे फ़र्क है
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अक्सर जिसे राजनीति समझा जाता है उसे political agency कहते हैं .... जैसे हमारे मोदी साहब अंबानी और अडानी के political agent हैं ...
असल मे इतिहास और अर्थतंत्र की समझ का विकास होते ही राजनीति स्वतः ही शुरु हो जाती है। ...
राजनीति प्रतिनिधित्व का संघर्ष मात्र है... कोई करियर नहीं ....
करियर दलाली मे हो सकता है।

ये सिर्फ मध्यम वर्गीय भ्रम होता है, जो political agency और politics मे अंतर नहीं कर पाते...
और political agency को राजनीति मान बैठते हैं ...
Political agent एक विधायक या सांसद होता है... वो राजनीतिज्ञ भी हो ये ज़रूरी नहीं।
राजनीति मे कुर्बानी भी देनी पड़ती है...
भगत सिंह राजनीतिज्ञ थे.... और वो कत्ल कर दिए गये...
वर्ग संघर्ष ही राजनीति है।
जबतक जनता का शासन नहीं आता तबतक जनता के लिए संघर्ष करने वालों (जनता के राजनेता) को आतंकी साबित करके या सीधे-सीधे मार देने की कोशिश बरकरार रहती है।
और ये काम शोषक वर्ग के असल राजनेता अपने agent के माध्यम से करते हैं।
शोषक वर्ग के नेता अंबानी, टाटा, अडानी, बिरला जैसे राजघराने हैं। जो कभी खुद को राजनेता नही कहलवाते।

Friday, 25 March 2016

भगतसिंह: साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

छी न्यूज़, धिक् टीवी और थू टीवी के बारे में भगतसिंह के विचार:
''दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, वे अख़बारवाले हैं। पत...्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे पत्रकार, जिनका दिल व दिमाग़ ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं।'' — भगतसिंह ('साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज', जून, 1928 के ‘किरती’ में प्रकाशित)
#Socialism 

Saturday, 12 March 2016

'विजय माल्या 'देशद्रोही' है, या 'देशभक्त' ?

एक प्रश्न है, जो सचमुच इस पल बहुत उद्वेलित कर रहा है। इसका उत्तर चाहिए –
‘विजय माल्या ‘देशद्रोही’ है, या ‘देशभक्त’ ?
विजय माल्या ‘नेशनलिस्ट’ है, या ‘एंटीनेशनलिस्ट’ ?
वह ”हिंदुत्ववादी’ है, या ‘हिंदुत्व-विरोधी’ ?
वह ‘भारतीय’ है, या ‘प्रवासी’ ? एन आर आई ?
क्या वह किसी न्यायालय परिसर में कभी आयेगा, तो क्या कन्हैया की तरह उस पर कोई जानलेवा हमला करेगा ?
अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, सरदाना, चौरसिया और उनके मालिकान क्या उसके बारे में वैसा ही अमर्यादित और संगीन रवैया अपनाएँगे ?
क्या वह जो ८००० करोड़ रुपये लेकर भागा है, जो निस्सन्देह ग़रीब भारतीय जनता के टैक्स का ही रुपया था, जिसे भारतीय बैंकों ने उसे क़र्ज़ पर दिया था, वह क्या कभी वसूल होगा ?
क्या इस सवाल पर गुंडे लोग उसी तरह अभियान चलायेंगे, जैसा वे हम लोकतांत्रिक नागरिकों के विरुद्ध चलाते हैं?
भारतीय बहू-बेटियों के प्रति शराब विक्रेता विजय माल्या का रवैया क्या हिंदुत्ववादी संघ की विचारधारा के अनुरूप है ?
माल्या के बारे में गिरिराज सिंह, महेश शर्मा, अनुपम खेर, साध्वी प्राची, मोहन भागवत, जनरल बख़्शी, सुभाष चंद्र, नरेंद्र कोहली आदि की क्या राय है? क्या इनका वक्तव्य कभी आयेगा ?
श्री श्री , बाबा रामदेव, आसाराम बापू आदि क्या माल्या के बारे में कोई देशभक्ति से संपन्न आध्यात्मिक संदेश देश के हिंदुओं को देंगे ?
क्या कभी सचमुच माल्या भारत आकर सारी लूट लौटायेगा? या सब कुछ ‘वेव ऑफ’ कर दिया जायेगा ?
किसका देश है ये ?
और प्रधानमंत्री क्या इस देश की सवा सौ करोड़ जनता का ही है ?
मन उद्विग्न है।
प्रश्न ही प्रश्न हैं।
उत्तर ‘भक्तों’ से नहीं, उनके आराध्य हुक्मरानों से चाहिए।
दुखद।
Uday Prakash

Thursday, 3 March 2016

India 3 In Number Of Forbes Billionaires; 130 In HDI

Very good point brought out by the author! Unite & resit against this unjust! But friends, think bit lateral! Present economic, social pathetic conditions of Crores of the working class, peasants is not due shortage of wealth created by them, but due appropriation of that wealth by the bourgeois class and their henchmen!
Fighting, after the production is completed & appropriated by the very few, is meaningless! Control the means of production, means of subsistence, all natural wealth of the nation, public property! They belong to you! Demolish the base of inequality, unemployment, superstition!
Stop giving the example of failed USSR; Capitalism is more than 500 years old, diseased, failed and close to graveyard! We need to unite & bury the present to let the birth of a new society; free of all forms of exploitation; take place! If not normal, due resistance of the old, caesarean is must!

Wednesday, 17 February 2016

आईएस, तुर्की और तेल की तस्करी

रूस का आरोप है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तय्यप एरदोवान व्यक्तिगत रूप से आईएस की तेल तस्करी में शामिल हैं. सबूत आने बाकी हैं, लेकिन यह तय है कि आईएस के इलाके से तेल तुर्की में पहुंच रहा है और आईएस की कमाई हो रही है.
http://www.dw.com/hi/%E0%A4%86%E0%A4%88%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80/a-18890491?maca=hin-VAS-Banner-dw&gclid=CLTBleuzgMsCFQofaAodPA4B_g

Saturday, 9 January 2016

Reverse FDI!!

You clap on FDI, on something which was vehemently opposed by the present government, RSS and by you! Sudden change of your mind was not due change of economic situation of country but sheer greed, pressure from MNCs, US/IMA, and internal corporates! Why you changed, is your personal matter!
Equally important is capital flowing out of country, probably more than what is flowing in! As part of black money, illegal means as in above case, the profit extracted by foreigners through business & stock markets, our corporates investing if other countries!
Fine, you clap for the capitalist class, as you feel indebted to them for feeding you, donating your icons for election campaign, but know the truth, they are not for you, but their own interests!
#Socialism

Monday, 4 January 2016

हमसफ़र

ए हमसफ़र, तू मेरी चिंता ना कर!
सही मंज़िल तो ढूँढ,
निकल पड़ रास्ते पर,
पाएगा मुझे खुद ब खुद
अपने बाजू मे!