Friday, 18 May 2018

मुनाफे की हवस में मरते मजदूर

मजदूरों पर बढ़ते जुल्म, बढ़ता शोषण, बढती बेरोजगारी, घटते शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं, घटता सामाजिक, आर्थिक न्याय हर तरफ दिख रहा है. पूंजी की बादशाहत असहनीय हो रही है. जीवन व्यापन के साधन घाट रहे हैं.
ऊपर से फासीवाद की मार. श्रम मानून ध्वस्त कर दिए गए, जमीन अधिग्रहण कानून बनाया गया, पर्यावरण कानून बेमानी हो गए हैं; आधार कार्ड, जीएसटी, एफडीआई लागू किया गया, दिनचर्या के हर सामान पर एकाधिकार मूल्य (Monopoly prices) लगाये गए हैं. धर्म, जाति, देश, व्यक्तिवाद के नाम पर अत्याचार बढ़ रहा है मजदूर वर्ग और किसानों पर!
क्या हम बिना जन क्रांति के इस फासीवाद का मुकाबला कर सकते हैं, इसे ध्वस्त कर सकते हैं, और HSRA तथा भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के सपनों, यानि समाजवाद की स्थापना कर सकते हैं? 

(साथी सुनील कुमार द्वारा, निचे के आलेख को पढ़ें)



दिल्ली देश की राजधानी है जहां पर देश के नियम, कानून बनाने वाले और उसको लागू कराने वाले रहते हैं। देश के अन्य हिस्सों में यह समझा जाता है कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर है। कुछ घटनाओं पर हम नजर डालें तो यह पुलावी ख्याल ही लगता है। दिल्ली में आये दिन होती लूट और बलात्कार तो रोजमर्रा की घटना बन चुकी है। मुनाफे की हवस के कारण मजदूरों की आग में जल कर मरने की घटना भी तेजी से बढ़ती जा रही है। लूट, बलात्कार और मजदूरों की आग में जलने की घटनाओं में अंतर है; जहां पहली घटना से लोगों में आक्रोश दिखता है और लोग इसको बातचीत में खराब होती व्यवस्था के उदाहरण के तौर पर रखते हैं। मजदूरों के जलकर मर जाने की घटना के कारण लोगों में वह आक्रोश नहीं दिखता और न ही इसे व्यवस्था की नाकामी के रूप में माना जाता है। इन दोनों घटनाओं में यह भी एक अंतर है- जहां पर लूट (सड़क पर छीन लेना या घर में घुस कर डकैती करना) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा उत्पन्न की गई समस्या है, वहीं बलात्कार पूंजीवादी-बाजारवादी संस्कित की देन है। मजदूरों का फैक्ट्री में आग में जलकर मर जाना पूंजीवादी मुनाफे की हवस का परिणाम है।

मुनाफे की हवस की आग में 9 अप्रैल, 2018 को सुल्तानपुरी का राज पार्क में 4 मजदूर जल कर मर गए। सुल्तानपुरी का यह इलाका एक मध्यम वर्गीय रिहायशी इलाका है जहां पर करीब 500 के आस-पास घर हैं। इनमें से 100 से भी अधिक घरों में जूते, चप्पल, सिलाई और अन्य कामों की फैक्ट्रियां चलती हैं। इनमें से अधिकांश में जूते, चप्पल का काम होता है जिसमें पेस्टिंग से लेकर सिलाई तक का काम होता है। यहां पर काम करने वाले मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी के आधे में 10-12 घंटे काम कराया जाता है। यहां पर ज्यादातर मजदूर पीस रेट या 5-7 हजार रू. प्रति माह पर काम करते हैं। मजदूरों को लालच दिया जाता है कि रहने की जगह दी जायेगी। शहर में आवास की समस्या से जूझ रहे मजदूरों के लिए रहने की जगह मिलना बहुत बड़ी राहत जैसी होती है जिंसके कारण वह कम पैसे में भी काम करने को राजी हो जाते हैं। मालिक के लिए यह सोने पर सुहागा जैसे हो जाता है। उनको 24 घंटे का फ्री में मजदूर मिल जाता है जो किसी भी समय फैक्ट्री में लोडिंग, अनलोडिंग, चौकीदार का काम करते हैं। इसके बदले इनको टैरिस (छत) पर एक रूम मिल जाता है जिसमें 8-10 लोग रहते हैं और बनाते, खाते हैं। मालिक घर जाते वक्त फैक्ट्री में बाहर से ताले लगा देते हैं। इसके दो कारण हैं एक तो यह कि नये मजदूर कहीं काम अच्छा नहीं लगने के कारण भाग न जाए; दूसरा कि मजदूर रात में चोरी न कर ले।

10 अप्रैल को जब मैं सुल्तानपुरी के राज पार्क स्थित ए-197मकान पर पहुंचा (जहां पर एक दिन पहले आग लगी हुई थी) उस गली में सन्नाटा था। ए-197 के बगल वाले घर के सामने प्लास्टिक की तीन-चार कुर्सियां पड़ी थीं और गली के एक मुहाने पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे और मुझे देख रहे थे। ए-197 मकान को देखकर पूछने की जरूरत नहीं थी कि इसी फैक्ट्री ने एक दिन पहले चार जिन्दगियों को निगल लिया। यह मकान चार मंजिला है, नीचे वाले फ्लोर पर एक 4 फुट का गेट है। इसके अलावा ऊपर में दो रोशनदान लगा है जो कि आग लगने से काला हो चुका था। गेट के बगल में काले पत्थर पर मकान नं. ए-197, अनिता सदन और ऊं लिखा हुआ है। साथ ही स्वास्तिक का दो चिन्ह बना हुआ है, दिवाल के ऊपरी हिस्से पर सी.सी. टीवी कैमरा लगा हुआ था। लोगों ने बताया कि यह फैक्ट्री बृजेश गुप्ता की है जो कि ए-83 में रहते हैं। ए-197 में चप्पल बनाने का काम होता है जिसमें करीब 30-35मजदूर काम किया करते थे। इस इलाके में रविवार अवकाश होता है लेकिन बहुत सी कम्पनियों में काम होता है। जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार कारखाने में काम करने वाले मोहम्मद अली ने बताया कि यह फैक्ट्री 15 सालों से चल रही थी और 8-9 अप्रैल की रात 2बजे तक मजदूरों ने काम किया। 9 तारीख की सुबह यूपी के हरदोई जिला के अस्मदा गांव के मजदूर परिवारों के लिए बुरी खबर लेकर आई। अस्मदा गांव के रहने वाले मोहम्मद वारिस (18), मोहम्मद अय्यूब (17), मोहम्मद राजी (20) व मोहम्मद शान (17) 10तारीख की सुबह नहीं देख पाए और जलकर फैक्ट्री के अन्दर ही मर गए। चार लोगों के अलावा कई लोग जान बचाने के लिए छत से कूदे जिसमें उनको चोटें लगीं। मोहम्मद वारिस और मोहम्मद अय्यूब दोनां सगे भाई हैं जबकि मोहम्म्द राजी व मोहम्मद शान चचेरे भाई हैं। सुल्तानपुरी में यह आग की कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी फैक्ट्रियों में आग लग चुकी है लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो पाने के कारण न्यूज नहीं बन सकी।

आस-पास के लोगों के अनुसार इसमें आग करीब सुबह 6.30 बजे के करीब लगी। दमकल विभाग और पुलिस को सूचना 6.35 पर मिल चुकी थी। लोगों का कहना है कि मुहल्ले के काफी लोग इक्ट्ठा हो गए थे, लेकिन बिजली कटी नहीं थी इसलिए लोगों ने पहलकदमी नहीं ली। दमकल की दर्जनों गाड़ियों ने मिलकर करीब दो घंटे में आग पर काबू पाई और लोगों को संजय गांधी अस्पताल पहुंचाया, जिसमें से चार लोगों को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

इस तरह की दिल्ली में यह पहली घटना नहीं है अभी जनवरी माह में ही बवाना सेक्टर 5 में आग लगने से 17 मजदूरों की जान चली गई। इस घटना में भी कहा जाता है कि काफी संख्या में मजदूरों की मौत हुई, लेकिन फैक्ट्री में जो मजदूर रहते थे उनका पता नहीं चल पाया। इससे पहले पीरागढ़ी, मंडोली, शादीपुर, शाहपुर जाट इत्यादि जगहों पर दर्जनों मजदूरों की जानें जा चुकी हैं। बवाना, सुल्तानपुरी, नरेला के बाद नवादा की क्रॉकरी फैक्ट्री में लगी आग ने तीन मजदूरों को निगल लिया है और चार मजदूर लपाता हैं। यह घटना भी नरेला, सुल्तानपुरी की घटना की ही पुनरावृत्ति है। मालिक बाहर से ताला लगाकर काम करा रहे थे और दिल्ली और केन्द्र सरकार सो रही थी।

इस तरह की घटना के बाद जब उक्त जगह पर जाते हैं तो पीड़ित मजदूर नहीं मिल पाते हैं। सही जानकारी इक्ट्ठा करना मुश्किल होता है लेकिन इंडस्ट्रीयल एरिया में होने से कुछ तथ्य मिल जाते हैं। सुल्तानपुरी जैसे रिहायशी इलाके में इस तरह की घटना होती है तो किसी भी तरह के मजदूर से मिल कर कुछ पता करना लगभग असंभव सी बात होती है। राज पार्क में जाने पर वही लोग मिलते हैं जो आस-पास फैक्ट्रियों के मालिक हैं। यह मालिक हर आने-जाने वाले बाहरी व्यक्तियों पर निगाह रखे होते हैं और अपनी बात सुनाते हैं कि मालिक कि किस्मत खराब थी, वह फंस गए। मीडिया वाले गलत बयान छाप रहे हैं- लड़के तो काम ही नहीं करते थे, वह तो घूमने आए थे, बाहर से कोई ताला बंद नहीं रहता था, इत्यादि, इत्यादि। जब तक कोई बाहरी व्यक्ति उस इलाके में रहता है यह लोग नजर बनाए रखते हैं कि वह कहां जा रहा है, किससे बात कर रहा है। पास में खड़े एक व्यक्ति ने इस मुद्दे को अलग रूप देने के लिए बोलता है कि हिन्दुस्तान एक नहीं हो रहा है लेकिन सऊदी अरब एक करना चाहता है। इस व्यक्ति का साफ-साफ इशारा हिन्दू-मुस्लिम करने का था। हम जान सकते हैं कि इस तरह की मानसिकता रखने वाले व्यक्ति मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान के मौत पर किस तरह सोचता होगा?

गांधी नगर रेडिमेड कपड़ों का जाना-माना मार्केट है। इस मार्केट की खबरें एक कोने से दूसरे कोने तक नहीं पहुंच पाती है। 22-23अप्रैल, 2018 की रात लगी आग और दो लोगों की मौत का पता करने जब मैं गांधी नगर पहुंचा तो बहुत लोगों को पता ही नहीं था कि यहां पर आग लगी है। कुछ लोगों को मीडिया से पता भी चला तो उनको यह मालूम नहीं था कि आग किधर लगी है और क्या नुकसान हुआ है। काफी लोगों से पूछने के बाद एक नौजवान ने बताया कि गुरूद्वारे वाले गली की तरफ आग लगी है। जब मैं घास मार्केट के मुख्य सड़क पर गया तब भी कोई आग लगने की बात नहीं बता पा रहा था। गुरूद्वारे वाले गली में जाने के बाद एक जूस विक्रेता ने उस गली के तरफ इशारा करते हुए बताया कि उस घर में आग लगी है। जब मैं उस मकान के पास गया (मकान नम्बर2490) तो माहौल देखकर नहीं लग रहा था कि इसी मकान में दो दिन पहले दो लोगों की जिन्दगी खत्म हो चुकी है। उस घर को देखने पर आग लगने का पता चल रहा है। बाकी उस मान में लोग आ जा रहे थे, कपड़े निकाल कर गाड़ी पर लादे जा रहे थे। कोई सिलिंग नहीं थी, सब कुछ सामान्य सा लग रहा था।

इस मकान के बगल में एक महिला से बात हुई तो वो बताया कि यहां पर दो-चार घर छो कर हर घर में फैक्ट्री व गोदाम है। 2490 नंबर मकान भी एक संकरी गली में है, जिसमें चार पहिया वाहन भी मुश्किल से जा सकता है। यह मकान 4 मंजिला है, जिकसी तीन मंजिलों में फैक्ट्री चलती है। सबसे ऊपर से मकान मालिक खुद रहते हैं और तीन मंजिल किराये पर दिए हुए हैं। इन ईलाकों में कोई श्रम कानून का पालन नहीं हो रहा है। मजदूरों को 8-10 हजार रू. प्रति माह देकर काम कराया जाता है, सप्ताहिक छुट्टी के अलावा और कोई नहीं दी जाती है। यहां तक कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी उस मकान को खानापूर्ति जांच के लिए भी सीलबंद करना उचित नहीं समझा गया। इस इलाके में चलने वाली हर फैक्ट्री मे रिहाईशी भी है, जो कभी भी दुर्घटना का एक बड़ा कारण बन सकता है। किसी भी फैक्ट्री में सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है। यहां तक कि इन मकानों के अन्दर एक ही दरवाजा होता है और आग से बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है। अगर प्रशासन का यही रवैया रहा तो कभी भी यहां बहुत बड़ा जान-माल का नुकसान हो सकता है।

दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर रिहायशी ईलाकों में फैक्ट्रियां चल रही हैं जहां पर मालिक मनमाने तरीके से काम करता है और किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं करता है। दिल्ली सरकार, केन्द्र सरकार,एमसीडी, प्रशासन चुप बैठा हुआ है। क्या इस तरह की घटना प्रशासन और सरकार की मिली-भगत के बिना हो सकती है? इस तरह की घटना होने के बाद केवल मुआवजे देकर सरकार अपनी जिम्मेवारी से इतिश्री कर लेती है। क्या मुआवजे देने से ही मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान जैसे लाखों मजदूरों को इन्साफ मिल पाएगा? सरकार, प्रशासन कब तक ऐसी फैक्ट्रियों को चलते रहने देगी, जो कि श्रम कानूनों को ताक पर रखकर चला रही हैं? कब तक मजदूरों की आवास की मांग को श्रम कानून में एक अधिकार के रूप में जोड़ा जाएगा? क्या इसी तरह मजदूर मरते रहेंगे और मजदूर, कर्मचारी यूनियनें हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगी? जब दिल्ली में मेहनकश जनता के साथ इस तरह से होता है तो देश के बाकी हिस्सों के विषय में हम सोच सकते हैं।

Floor Test as per SC desire to restore "Democracy"?

Yeddyurappa’s SC: Justice Sikri proposes floor test on Saturday.
(http://indianexpress.com/elections/b-s-yeddyurappas-supreme-court-live-updates-petitions-congress-jds-questioning-karnataka-governor-vala-decision-hearing-5181140/)
If Cong wins, there may seem to be justice to "Democracy", but to whom this democracy serves, 90-95% exploited workers/farmers or still the big capitalists, financiers, MNCs, their political "managers", top bureaucrats, police and judicial officers, religious and cultural thugs, middlemen? This question is neither on Social Media nor on Electronic Media, but must haunt the pro people thinkers, activists! 
Social media is trending hashtags like #KarnatakaCMRace "Floor Test" and many more after the Karnataka gave a hung Assembly, though BJP was the largest single party! BJP with the help of its "own" governor and "helping" SC attitude, made Yeddyurappa CM, with 15 days to "prove" its majority; which openly meant to buy, coax, blackmail with the help of CBI, Tax sleuths, etc  MLAs!
Yes, its abhorrent, especially for the middle class and intellectuals who are well placed in our society, do come out on election days to cast their votes, nay, to fulfil their obligations to democracy and post selfies, views, opinion through social media! 
See the sympathy of AAP towards Congress, in hope of "restoring" capitalist democracy, through its leaders Ashutosh on Twitter:
"ashutosh
@ashutosh83B
I still say Rahul Gandhi should sit on a Indefinite Dharna with their supporters outside assembly. This is the time to send a strong message to BJP and institutions who are crawling...
So, why don't join Congress as it's adviser?"
For them the victory of Congress will be Restoration of Democracy, which was murdered by BJP, forgetting the past, when the situation was diametrically opposite, 1975-77 Emergency! They are not concerned about Congress anti working class and anti farmers policies, which they wanted to enact, viz, Land Acquisition Bill, GST, FDI, Aadhaar Card, granting American Military to inspect our Military bases and installations, bowing to American/EU/Israel hegemony!
Congress proposed and BJP disposed, albeit, in harsher way, shamelessly, ruthlessly. All was and is to enhance the big corporates effort to hike their falling profit rates, due economic crisis, despite fudged GDP, which is a Universal phenomenon.
It is worth nothing here that the Indian manufacturing/production has shrunk to 70% of its total capacity, due non availability to find buyers of its goods and services! Unemployment is rising, so is inflation, crime, corruption and oppression on women, working class, Dalits, minorities, tribes. The difference in Congress and BJP is not in their contents but in forms, where the latter masks its intentions behind religion, caste, nationalism, personality cult, hawkish propaganda, open misuse of judiciary, police, CBI, EC, Governors and President, and all resources of State & Social power, which it has annexed in last 4 years!
So, will the victory of Congress assuage "Democracy", like in Bihar (?), at least for few months? But the economic policy was earlier as well as now remains same, the communal violence is increasing, social divide is increasing; in short, fascism, like in Italy, Germany earlier, and in Iran, Poland, Ukraine, partially in US now, is rising in India!
Fascism is another form of capitalism, like Crony Capitalism, State Capitalism, Monopoly Capitalism, etc. But Fascism is the most rotten and violent from of capitalism and same time its a social movement, where a section of society, especially the lumpen workers, unemployed youths, paid and unpaid goons, those who wish to remain closer to power centres and even "earn" some money for their livings!
Here it must be noted that the Emergency of 1975-77 was more of an administrative nature, while fascism, now among us, is not sheer dictatorship of the bourgeois class against the working class, farmers, but qualitatively different which has support from within us and has penetrated into all the departments of governance and pillars of democracy, including media, education, etc! Aim of fascism is to increase profit rate to maximum.
While we must understand the difference between Congress (and its dictatorship against the mass to serve its masters) and present fascism, which again serves same masters, hidden in nationalism and religious colours, is ugly, violent and plunders the mass openly and deeply, without any hesitation, with full force, which some people mistakenly take it as a symbol of powerful country, which again is a myth; if you can decipher what "respect" our Prime Minister is getting in foreign countries, where he has to save his face through event management by paid and managed Indian crowds, run to airport to even to welcome another criminal Netanyahu, PM of a very small country, unless you are inundated by fake and photoshopped video and pictures!
So friends, time to understand similarities and contradictions between Congress and BJP and even other political parties, who had been their allies or are allies now; find alternative to these criminal parasites, join politics, in whatever forms and in limited sense but get out of the vicious circle of these bourgeois political parties and their rhetoric and jingoism! 

We need democracy, which is for 90-95% of the population, the workers and farmers and not for the 5% elites and their puppets, agents! Why democracy of the majority? To ensure 100% employment to all the working hands, free education and health services to all as a basic right to workers, equal opportunities to all the members of the society, end of wage slavery, parasitism and inequality! 

Tuesday, 15 May 2018

क्या हम फासीवाद का विरोध सही राजनितिक लाइन पर कर रहे हैं?

फासीवाद बढ़ रहा है. मिहनतकाश आवाम का शोषण बढ़ रहा है और जुल्म भी बढ़ रहा है. सही बात है! पर एक बात पर गौर करने की जरुरत है! हम मोदी और उसके संगठन, यानि आरएसएस, भाजपा और अन्य संगठनों का कितना भी भन्डा फोड़ दें, जनता को उसकी पोल खोल कर दिखा दें, वह बढ़ता ही जा रहा है! उसकी सरकार त्रिपुरा में बनी, कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी, बंगाल और दिल्ली में भी बढ़ रहा है, बिहार, गोवा, नागालैंड में हार कर भी सत्ता में है! गुजरात में भले ही कद घटा हो, पंजाब में हारा हो, पर कुल मिलकर उसका मुद्दा, कर्ह्क्रम आगे बढ़ रहा है! न्यायलय, पुलिस, प्रशाषण, शिक्षा, सीबीआई, आरबीआई, चुनाव आयोग, आदि उसके कब्जे में है. विरोधी दल, वाम तक भी हतप्रभ हैं. हर चाल उल्टा पड़ रहा है! दोस्तों, हम जितना भी ताकत लगा रहे हैं, काम कर रहे हों, लिख रहे हों, सोशल मिडिया पर अपना अलग पहचान बना रहे हों, पर फासीवाद आगे बढ़ है! फासीवाद क्या है? यह पूंजीवाद ही है, जैसे मोनोपोली पूंजीवाद या क्रोनी पूंजीवाद. पर फासीवाद पूंजीवाद का बेहद ही सड़ांध और हिंसात्मक रूप है. साथ साथ यह एक सामाजिक आन्दोलन भी है, जिसमे समाज का एक हिस्सा, जिसमे लम्पट बेरोजगार, मुर्ख युवा वर्ग, मध्यम वर्गीय कुपमंडूक, असामाजिक तत्व और हिन्दू राष्ट्र के उम्मीद में अंधे बने लोग हैं! यही कारन है की हमारे प्रोपगंडा, हमारा तार्किक और वैज्ञानिक प्रचार असफल हो रहा है! यह भी ध्यान रखने की बात है की फासीवाद अरबों रुपये और मिडिया का उपयोग तथा दुष्प्रचार बड़े ही सलीके से चला रहा है और सत्ता में बना ही नहीं हुआ है बल्कि विपक्षियों को ख़त्म कर रहा है, अपने मालिकों, पूंजीपतियों को भारी मुनाफा दिलवा रहा है, क़ानूनी और गैर क़ानूनी तरीके से, और खुद के लिए भारी दलाली! तो दोस्तों, फासीवाद को सामान्य तरीके से नहीं हरा सकते, ना ही चुनाव के द्वारा, ना ही प्रचार और बड़े बड़े रैलियों के द्वारा. 2019 के बाद तो वह भी नहीं करने दिया जायेगा “राष्ट्रिय” हित में. और बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, मजदूर वर्ग और किसानों पर अत्याचार बढेगा! जेल अभी ही भरे हुए हैं, उसके पार्क में भी जगह नहीं बचेगा! शायद कब्रगाह में जगह रहे!! और इनका लक्ष्य एक ही है, मुनाफा और ज्यादा मुनाफा! तो सोचने की जरुरत है की क्या करें? क्रन्तिकारी पार्टी! वैसे कभी सोचा है कि कोई ऐसी क्रन्तिकारी पार्टी है जो पुरे तौर पर पुलिस और इंटेलिजेंस को पता हो? बिना अंडर ग्राउंड कैडर के? बिना पार्टी के सदस्यों को प्रशिक्षण देने के, ताकि वह भी नेता बने और पार्टी को आगे चला सकें? कभी सोचा है कि क्यूँ एक क्रन्तिकारी पार्टी के सदस्य निकल कर भाजपा या कौंग्रेस में जा रहे हैं, क्यूँ सत्ता से हटने के बाद पार्टी के सदस्य त्राहिमाम कर रहे हैं, राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक से सुरक्षा की भीख मांग रहे हैं? क्रांतिकरी पार्टी, क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ. चुनाव जितने के लिए नहीं, बल्कि पूंजीवादी प्रजातंत्र के पोल खोलने के लिए और उसे ध्वस्त करने के लिए! मजदूर वर्ग, किसान फिर से उठ रहा है, हर रोज संघर्ष में शामिल है, रोजगार के लिए और अपने गिरते हुए मजदूरी और जीवन को संभालने के लिए! जरुरत है फिर से क्रन्तिकारी रास्ते की तरफ चलने की, विद्रोह का झंडा बुलंद करने के लिए! जिसे क्रांति की जरुरत है वह समझता है कि कौन धूर्त है और पूंजी की दलाली कर रहा है और कौन सी पार्टी उसके मुक्ति के लिए काम कर रहा है!

Saturday, 12 May 2018

Women's Day: Meaningless unless society changes

Mother's day is absurd, unless all women get their freedom economically.
This freedom is curtailed in a patriarchal society which is misogyny, by all means. Religion, caste, colour, nationality, gender bias and all forms of byproducts of today's economic, social, political order are meant to oppress women, their liberty, equality and even safety.
Mother's day or any such glorification of women is nothing but a form to mask their real miseries, inequality that the present society has bestowed upon them, oppression, which often culminates into rape, the ultimate humiliation and physical punishment by men, who came into existence due women!
It is told with "pride" that prostitution is the oldest profession and many advanced and "modern" nations have given it a legal cover, where Sex-Workers can earn their wages "respectfully", without much hindrance. This in any case has failed to give Sex-Workers any respect, safety.
Yes, legalising prostitution has given a boost to the falling GDP, as huge taxes are collected by the capitalist governments! They are celebrating Mother's Day!! If prostitution is legal, then rape is theft or loot of women's body, which is a factory of "sexual pleasure".
Women's oppression started from the day, on this earth, when the division of work started in our society, firstly based on gender basis. This happened when humanity started settling in a particular area, where it could find safety, source of water and better management of basic subsistence, like food and could store them for future. Women took care of households, as physically they got confined to the "base area", during pregnancy and to take care of babies. This division was natural but in course of time, as productivity increased, few could eat without working, on other's work. With rise of Private Property, men looked for heritance for their wealth and demanded monogamy.
Here ended polygamy and all freedom, equality of women. The concept of father started. Men remained polygamy, continued their "right" to copulate with many women, despite all laws, in various forms, till today. Prostitution, rape, women's oppression, domestic violence, pornography, fashion world, beauty contest, etc are various forms to not only keep men's hegemony over women but even turned women into commodity to extract huge profit, the base of capitalism.
Do you foresee women's freedom, equality and safety in capitalism, which is meant to extract profit by all means, and which not only continues women's subjugation to men and production for profit but increases it?
Only Socialism to emancipate women, along with the working class and other exploited sections of the society, as all of them are suffering due capital's hegemony and thus have common enemy, namely, capital!

Tuesday, 8 May 2018

Viral On Bharat: रिलायंस Jio के कारण देश को हुआ 2484 करोड़ का नुकसान...

Viral On Bharat: रिलायंस Jio के कारण देश को हुआ 2484 करोड़ का नुकसान...: मोदी सरकार ने मुकेश अम्बानी की दूरसंचार कंपनी रिलायंस जियो को ऐसा ऐसा लाइसेंस दिया है जिसके कारण जैसे-जैसे जियो के ग्राहक बढ़ रहे हैं वैसे...



गद्दारों, बलात्कारियों, दंगाइयों की पार्टी है भाजपा/आरएसएस! सावधान!

मजदूर वर्ग और किसानों की एकता और संघर्ष ही रास्ता है इन परजीवी अपराधियों से मुक्ति के लिए!

Thursday, 3 May 2018

Viral On Bharat: बीजेपी ने लगाया राजद्रोह का केस तो बोला पत्रकार, स...

Viral On Bharat: बीजेपी ने लगाया राजद्रोह का केस तो बोला पत्रकार, स...: छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार के खिलाफ राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योकिं पत्रकार ने कोर्ट और सरकार के खिलाफ बने कथि...



शाबाश! चाटुकारों, दलालों के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा!