Sunday, 10 April 2016

मजहब बनाम वैयक्तिक विचार

मजहब को वैयक्तिक विचार से अधिक महत्व नहीं मिलना चाहिए। देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास की मौके-बे-मौके जिस प्रकार दुहाई दी जाती है, वह भी हमारे कार्य में बाधा डालने वाली है। मनुष्य लाखों बरस के विकास के बाद आज यहाँ पहुँचा है। पहले उसके विकास की गति मंद रही, लेकिन इधर वह तीव्र होती गयी। मनुष्य के इतिहास के किन्हीं भी दो समयों में एक परिस्थिति नहीं रही। हमेशा समस्याएँ नयी उठीं और उनके हल भी नये निकालने पड़े। अपने भूत के प्रति गौरव और आवश्यकता से अधिक अनुराग हमारे लिए बड़ी ख़तरनाक चीज़ है। वह हमारी पुरानी बेवकूफियों के प्रति आदर का भाव पैदा कर देता है। आज जिन सामाजिक और धार्मिक ख़राबियों को हम देख रहे हैं, उनकी जड़ उसी भूत की श्रद्धा में निहित है।
-- राहुल सांकृत्यायन

Friday, 8 April 2016

धार्मिक कट्टरवाद और वैज्ञानिक समाजवाद

बांग्लादेश में विगत तीन वर्षों के भीतर ही नजीमुद्दीन समद के पूर्व फैसल अर्फ़िंन दीपन,निलय नील,अनंत विजय दास,वैसिकुर्र रहमान,अभिजीत रॉय,शफीउल इस्लाम,अहमद रजीब हैदर आदि तर्कवादी नास्तिकों की भी नृशंस हत्या की जा चुकी है।इसी कड़ी में नास्तिक ब्लॉगर आसिफ़ मोहिउद्दीन,सुन्निउर रहमान आदि पर जानलेवा हमला भी हो चुका है।ऐसे सभी कुकर्मों में वैसे इस्लामी कट्टरवादी शामिल रहे हैं जिन जाहिलों को इस्लाम या कुरान पर तर्कवादी दृष्टिकोण से की गई कोई भी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।
ऐसा ही हाल अपने देश भारत में पनसारे,दाभोलकर और कलबर्गी जैसे तर्कवादियों का हुआ है, जिनकी कायराना हत्या का संदेह कट्टर हिंदूवादी तत्वों पर है।इन धर्मविमूढ़ अंधों को भी तर्कवादी इसलिए बर्दाश्त नहीं थे क्योंकि ये हिन्दू धर्म से सम्बंधित अंधविश्वासों का प्रतिरोध करते थे।
ये सभी धार्मिक कट्टरवादी, वैश्विक पैमाने पर प्रगतिशील,वैज्ञानिक और क्रांतिकारी विचारों,वैज्ञानिक समाजवाद,साम्यवाद के कमजोर पड़ते ही इतिहास के कूड़ेदान से अपना घिनौना चेहरा लिए इस कदर प्रकट हो गए हैं जैसे गोबर के ढेर पर कुकुरमुत्ते।लगता है इन मानवविरोधी धार्मिक विक्षिप्तों की अंतिम पराजय के पूर्व अभी मानवजाति के अनेक विद्वान सपूतों को अपनी जान इन जाहिलों के हाथों गंवानी पड़ेगी।समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन संबंधी वैज्ञानिक विचारों के विरुद्ध पूंजीवाद के कुत्सा प्रचार अभियान में धार्मिक कट्टरवादियों से की गई उसकी गलबहियों की बड़ी भारी कीमत मानवजाति को चुकानी पड़ेगी ऐसा प्रतीत होता है।

Wednesday, 6 April 2016

गड्डे से बाहर निकलने के बारे में!

हमारा समय एक ऐसे विशाल, गहरे, अंधकारमय दलदली गड्डे के समान है, जिसमें समाज के संवेदनशील बौद्धिक जन भी धँसे पड़े हैं। इनमें से कुछ बस उन दिनों को याद करके राहत पाने की निष्फल कोशिश कर रहे हैं, जब वे गड्डे के बाहर थे।
कुछ ऐसे हैं जिन्होंने गड्डे के जीवन को अपनी नियति मान लिया है। वे गड्डे के जीवन में ही सार्थकता और सौन्दर्य का संधान कर रहे हैं या फिर इसी गड्डे में किसी बेहतर, सुकूनतलब, सूखे कोने की तलाश को एकमात्र मुक्तिमार्ग बताने लगे हैं।
कुछ हैं जो बाहर की स्वच्छ ताज़ा हवा वाली दुनिया को एक मिथकीय महाख्यान घोषित कर चुके हैं और गड्डे और गड्डे के बाहर की दुनिया के अन्तर को मात्र एक भाषाशास्त्रीय खेल या मनोगत विभ्रम बता रहे हैं। 
कुछ निरुपाय –असहाय आशावादी हैं जो गड्डे में लेटे हुए ऊपर आसमान में छिटके तारों की रोशनी की ओर देखते रहते हैं। लेकिन बहुत थोड़े से ऐसे लोग भी हैं जो गड्डे से बाहर निकलने के बारे में आश्वस्त हैं और इसके लिए भिड़ायी जाने वाली जुगतों के बारे में लगातार बातें भी कर रहे हैं।
कविता कृष्णपल्लवी