कात्यायनी की कविताओं के संकलन "राख-अँधेरे की बारिश में" में से उनके द्वारा वर्ष 1993 में लिखी गयी कविता
"आस्था का प्रश्न"
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"आस्था का प्रश्न"
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तर्क नहीं होता
आस्था के प्रश्न पर
आस्था का न्याय से
कोई सम्बन्ध नहीं होता।
आँखें नहीं होतीं आस्था की,
कुछ भी कर सकती है-
सड़कों पर
नाच सकती है डायनों-सी
खप्पर में पीती हुई बच्चों का खून,
विकट रूप धर, बस्तियों को
राख करती
दिल्ली तक जा सकती है,
मच्छर बन मतपेटियों में
समा सकती है,
भीम रूप धर संसद में
प्रवेश पा सकती है।
तर्क को सैकड़ों फुट नीचे
दफ़्न कर सकती है आस्था,
इतिहास की कपाल-क्रिया कर
अपने तथ्य खुद गढ़ सकती है।
आस्था केवल बहुमत का
अधिकार होती है,
आस्था उन्माद की अम्मा होती है,
मतदान-यज्ञ की कृत्या होती है
आस्था।
रहना चाहते हो यदि इस मुल्क में
तो आस्थावान बनो।
महान पूर्वजों के वारिस
महान बनो।
#Socialism
आस्था के प्रश्न पर
आस्था का न्याय से
कोई सम्बन्ध नहीं होता।
आँखें नहीं होतीं आस्था की,
कुछ भी कर सकती है-
सड़कों पर
नाच सकती है डायनों-सी
खप्पर में पीती हुई बच्चों का खून,
विकट रूप धर, बस्तियों को
राख करती
दिल्ली तक जा सकती है,
मच्छर बन मतपेटियों में
समा सकती है,
भीम रूप धर संसद में
प्रवेश पा सकती है।
तर्क को सैकड़ों फुट नीचे
दफ़्न कर सकती है आस्था,
इतिहास की कपाल-क्रिया कर
अपने तथ्य खुद गढ़ सकती है।
आस्था केवल बहुमत का
अधिकार होती है,
आस्था उन्माद की अम्मा होती है,
मतदान-यज्ञ की कृत्या होती है
आस्था।
रहना चाहते हो यदि इस मुल्क में
तो आस्थावान बनो।
महान पूर्वजों के वारिस
महान बनो।
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