मैं दिवाली या कोई भी अन्य पर्व नहीं मनाता. भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित हूं. इसलिए मैं नास्तिक हूँ.
पर्व ना मनाने के पीछे एक दूसरा कारण भी है. हमारे देश में करीब 10 करोड़ ऐसे बच्चे या बच्चियां हैं जो जीवन जीने के न्यूनतम सुविधा से भी वंचित हैं.
मजबूरी में वे भीख मांगते हैं, बाल मज़दूरी करते हैं, छोटे अपराध में शामिल किये जाते हैं, वेश्यावृत्ति में ढकेल दिये जाते हैं.
हजारों लाखों जेल, अनाथालय में सड़ रहे हैं.
ये बच्चे शिक्षा और बचपन से मरहूम होते हैं. मैं भला किसी पर्व में कैसे शामिल होंउ?
क्या इन बच्चों, बेरोजगार युवकों, प्रताड़ित महिलाओं, दलितों, अल्प संख्यकों, मजदूर और किसानों को पूंजीवाद में न्याय मिल सकता है?
यदि हां तो आपसे मेरी सम्वाद मुश्किल है.
यदि ना, तो हम लोग अलग थलग क्यों हैं?
आइये, हम एक साथ मिलकर इस शोषण और प्रतारणा पर आधारित व्यवस्था को दफ़न कर एक नए न्याय सम्मत समाज के आधारशिला का निर्माण करें.
समाजवादी समाज स्थापित करें!
पर्व ना मनाने के पीछे एक दूसरा कारण भी है. हमारे देश में करीब 10 करोड़ ऐसे बच्चे या बच्चियां हैं जो जीवन जीने के न्यूनतम सुविधा से भी वंचित हैं.
मजबूरी में वे भीख मांगते हैं, बाल मज़दूरी करते हैं, छोटे अपराध में शामिल किये जाते हैं, वेश्यावृत्ति में ढकेल दिये जाते हैं.
हजारों लाखों जेल, अनाथालय में सड़ रहे हैं.
ये बच्चे शिक्षा और बचपन से मरहूम होते हैं. मैं भला किसी पर्व में कैसे शामिल होंउ?
क्या इन बच्चों, बेरोजगार युवकों, प्रताड़ित महिलाओं, दलितों, अल्प संख्यकों, मजदूर और किसानों को पूंजीवाद में न्याय मिल सकता है?
यदि हां तो आपसे मेरी सम्वाद मुश्किल है.
यदि ना, तो हम लोग अलग थलग क्यों हैं?
आइये, हम एक साथ मिलकर इस शोषण और प्रतारणा पर आधारित व्यवस्था को दफ़न कर एक नए न्याय सम्मत समाज के आधारशिला का निर्माण करें.
समाजवादी समाज स्थापित करें!
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