Friday, 8 April 2016

धार्मिक कट्टरवाद और वैज्ञानिक समाजवाद

बांग्लादेश में विगत तीन वर्षों के भीतर ही नजीमुद्दीन समद के पूर्व फैसल अर्फ़िंन दीपन,निलय नील,अनंत विजय दास,वैसिकुर्र रहमान,अभिजीत रॉय,शफीउल इस्लाम,अहमद रजीब हैदर आदि तर्कवादी नास्तिकों की भी नृशंस हत्या की जा चुकी है।इसी कड़ी में नास्तिक ब्लॉगर आसिफ़ मोहिउद्दीन,सुन्निउर रहमान आदि पर जानलेवा हमला भी हो चुका है।ऐसे सभी कुकर्मों में वैसे इस्लामी कट्टरवादी शामिल रहे हैं जिन जाहिलों को इस्लाम या कुरान पर तर्कवादी दृष्टिकोण से की गई कोई भी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।
ऐसा ही हाल अपने देश भारत में पनसारे,दाभोलकर और कलबर्गी जैसे तर्कवादियों का हुआ है, जिनकी कायराना हत्या का संदेह कट्टर हिंदूवादी तत्वों पर है।इन धर्मविमूढ़ अंधों को भी तर्कवादी इसलिए बर्दाश्त नहीं थे क्योंकि ये हिन्दू धर्म से सम्बंधित अंधविश्वासों का प्रतिरोध करते थे।
ये सभी धार्मिक कट्टरवादी, वैश्विक पैमाने पर प्रगतिशील,वैज्ञानिक और क्रांतिकारी विचारों,वैज्ञानिक समाजवाद,साम्यवाद के कमजोर पड़ते ही इतिहास के कूड़ेदान से अपना घिनौना चेहरा लिए इस कदर प्रकट हो गए हैं जैसे गोबर के ढेर पर कुकुरमुत्ते।लगता है इन मानवविरोधी धार्मिक विक्षिप्तों की अंतिम पराजय के पूर्व अभी मानवजाति के अनेक विद्वान सपूतों को अपनी जान इन जाहिलों के हाथों गंवानी पड़ेगी।समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन संबंधी वैज्ञानिक विचारों के विरुद्ध पूंजीवाद के कुत्सा प्रचार अभियान में धार्मिक कट्टरवादियों से की गई उसकी गलबहियों की बड़ी भारी कीमत मानवजाति को चुकानी पड़ेगी ऐसा प्रतीत होता है।

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