हमारा समय एक ऐसे विशाल, गहरे, अंधकारमय दलदली गड्डे के समान है, जिसमें समाज के संवेदनशील बौद्धिक जन भी धँसे पड़े हैं। इनमें से कुछ बस उन दिनों को याद करके राहत पाने की निष्फल कोशिश कर रहे हैं, जब वे गड्डे के बाहर थे।
कुछ ऐसे हैं जिन्होंने गड्डे के जीवन को अपनी नियति मान लिया है। वे गड्डे के जीवन में ही सार्थकता और सौन्दर्य का संधान कर रहे हैं या फिर इसी गड्डे में किसी बेहतर, सुकूनतलब, सूखे कोने की तलाश को एकमात्र मुक्तिमार्ग बताने लगे हैं।
कुछ हैं जो बाहर की स्वच्छ ताज़ा हवा वाली दुनिया को एक मिथकीय महाख्यान घोषित कर चुके हैं और गड्डे और गड्डे के बाहर की दुनिया के अन्तर को मात्र एक भाषाशास्त्रीय खेल या मनोगत विभ्रम बता रहे हैं।
कुछ निरुपाय –असहाय आशावादी हैं जो गड्डे में लेटे हुए ऊपर आसमान में छिटके तारों की रोशनी की ओर देखते रहते हैं। लेकिन बहुत थोड़े से ऐसे लोग भी हैं जो गड्डे से बाहर निकलने के बारे में आश्वस्त हैं और इसके लिए भिड़ायी जाने वाली जुगतों के बारे में लगातार बातें भी कर रहे हैं।
कविता कृष्णपल्लवी
कुछ ऐसे हैं जिन्होंने गड्डे के जीवन को अपनी नियति मान लिया है। वे गड्डे के जीवन में ही सार्थकता और सौन्दर्य का संधान कर रहे हैं या फिर इसी गड्डे में किसी बेहतर, सुकूनतलब, सूखे कोने की तलाश को एकमात्र मुक्तिमार्ग बताने लगे हैं।
कुछ हैं जो बाहर की स्वच्छ ताज़ा हवा वाली दुनिया को एक मिथकीय महाख्यान घोषित कर चुके हैं और गड्डे और गड्डे के बाहर की दुनिया के अन्तर को मात्र एक भाषाशास्त्रीय खेल या मनोगत विभ्रम बता रहे हैं।
कुछ निरुपाय –असहाय आशावादी हैं जो गड्डे में लेटे हुए ऊपर आसमान में छिटके तारों की रोशनी की ओर देखते रहते हैं। लेकिन बहुत थोड़े से ऐसे लोग भी हैं जो गड्डे से बाहर निकलने के बारे में आश्वस्त हैं और इसके लिए भिड़ायी जाने वाली जुगतों के बारे में लगातार बातें भी कर रहे हैं।
कविता कृष्णपल्लवी
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