Saturday, 8 December 2018

सुधार नहीं क्रांति के लिए संघर्ष करो!

यदि EVM में हेरा फेरी ना हुआ तो भाजपा की हार 5 राज्यों के चुनाव में नजर आ रहा है. यह अरबों-खरबों की लागत, दुष्प्रचार, हिन्दू-मुसलमान कर जनता को बांटने, झूठ और मक्कारी के बावजूद हो रहा है. यदि हार जबरदस्त ना हो, तो भी आरएसएस का गिरता ग्राफ तो साफ़ नजर आ रहा है.
साथियों, पर क्या यह ऐसा बदलाव है, जिसके लिए हम लड़ रहे हैं? कौंग्रेस की वापसी मजदूर वर्ग और किसानों के लिए शुभ संकेत है? क्या दलित, अल्प संख्यक, आदिवासी, महिलाएं अब एक शोषण विहीन समाज में रहने के सपने देखने के अधिकारी हो जायेंगे?
साथियों क्या इस बदलाव से हमें 100% रोजगार मिल जायेगा, गुणवत्ता शिक्षा और स्वस्थ्य सेवा मुहैया होगा, आवास की समस्या का निदान होगा, क्या पुलिस और प्रशाषण के प्रतारानाओं से मुक्त हो जायेंगे, क्या हम एक इंसान की तरह जी सकेंगे?
साथियों, याद रखें, कौंग्रेस और इसके भिन्न सहयोगी दल, जिसमे से कई अब भाजपा के सहयोगी हो गए हैं या पहले थे, बड़े पूंजीपति वर्ग के दलाल हैं और उसी के लिए काम कर रहे हैं. ये सारे हमारे ही नाम लेकर हमें जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर हमें कई खेमों में बाँट दिया है. हमें एक दुसरे से दुश्मनों की तरह लड़वा रहे हैं. जबकि हमारा असली दुश्मन तो पूंजीपति वर्ग और उसके दलाल राजनितिक दल, धर्म और संस्कृति के ठेकेदार और पाखंडी, प्रशाशन और पुलिस के बड़े ऑफिसर हैं. न्यायलय में भी हमारी सुनवाई नहीं है. कानून बदल कर बड़े पूंजीपतियों की सेवा की जाती है और दलाली कमाई जाती है.
साथियों, आज इन बातों को समझना जरुरी है. नहीं तो फिर हम पुराने चक्र में ही फंसे रहेंगे, यानि कौंग्रेस, भाजपा, तीसरा या चौथा मोर्चा करते रहेंगे. और हमारी मुक्ति, हमारा सपना कभी भी पूरा नहीं होगा.
साथियों, हमें ऐसे बदलाव की दरोकार नहीं जो केवल सत्ता बदले, पार्टी बदले, चेहरे बदले, कुछ कानून बदले, हमें कुछ "दान" दे दे, पर मूलतः पूंजीवादी सत्ता को बरक़रार रखे!
साथियों, हमें ऐसा बदलाव चाहिए, जिसमें पूंजीवाद को ही ध्वस्त करे, इसके शोषण और प्रतारण को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करे, जहाँ हर हाथ को काम और हर परजीवी को कारावास हो, जहाँ धर्म और जाति से शासन और विभाजन ना हो. यानी एक समाजवादी समाज हो, जहाँ एक मनुष्य दुसरे मनुष्य का शोषण ना कर सके!
साथियों, सोचने का समय तो ख़त्म हो चूका है, आगे बढ़ो, समाज के ऐसे बदलाव के लिए जो केवल ऊपर से ना हो बल्कि इसके आधार को ही बदल दे, यानि क्रांतिकारी परिवर्तन हो!
इन्कलाब का समय है, सुधार या कुछ मांगो को लेकर संतुष्ट होने का नहीं!

"जब भी कोई परिवर्तन आंतरिक तंत्र को छूता है, तो हमारे पास सुधार होता है; जब भी आंतरिक तंत्र बदल जाता है, तो हमारे पास क्रांति होती है": डैनियल लिओन!

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