कबतक चमचे या उसके भी चमचे बने रहोगे? आत्म
सम्मान जैसी कोई चीज है की नहीं तुम्हारे भेजे में?
भारत में वीरों की कमी कभी नहीं रही. अन्याय के
खिलाफ विद्रोह का इतिहास भी भरा हुआ है! 1857 का ग़दर, झाँसी
की रानी लक्ष्मी बाई, बिरसा मुंडा, सावित्री
बाई फुले, पेरियार, भगत सिंह और
उनके सैकड़ों साथी, तेलांगना आन्दोलन, नक्सलवाड़ी, बॉम्बे विद्रोह,
जिसमे नेवी और बाकि ने भी साथ दिया, आदि!
खुदीराम बोस जिसे अंग्रेजों ने 18 साल, 8 महीने
और 8 दिन के उम्र में फांसी पर लटका दिया! याद रहे, तक़रीबन इसी उम्र में अटल बिहारी
वाजपेयी ने 1942 में अंग्रेजों से कहा की उनका भारत छोडो आन्दोलन से कोई लेना देना
नहीं है और छुट गए!
1975, 2012 आन्दोलन भी अन्याय के खिलाफ था! 1942
साम्राज्यवाद के खिलाफ था! वैचारिक धारा में भी हम बहुत पीछे नहीं रहे हैं!
द्वंदात्मक भौतिकवाद में भी, विज्ञान के कमी के बावजूद चार्वाक काफी आगे थे तार्किक समझ में! मार्क्सवादी भगत सिंह, महान
लेखक प्रेमचंद भी साम्यवादी थे. राहुल संकृत्यायन कही से पीछे नहीं थे, विश्व स्तर
के जाने माने समाजवादी लेखक थे! यहाँ पर रविन्द्रनाथ टैगोरे का नाम लेना गलत नहीं
होगा!
गणित के महान विद्वान आर्यभट (476-550), यातिवृषभ
(लगभग 500-570; दूरी तथा समय मापने की इकाइयों की समीक्षा), वराहमिहिर, भास्कर प्रथम (620) को कौन
नकार सकता है?
फिर ऐसा क्या हुआ, जिसके कारन हम पाश्यात्य
सभ्यता, धन और शक्ति के कायल हो गए? स्वतंत्रता के पहेले अंग्रेजों के,
जिसमे
महारथ हासिल की थी आरएसएस ने और अब अमेरिकों की चापलूसी? कौंग्रेस,
भाजपा
और बाकि सारे इनके साथी, जो कभी ना कभी सत्ता के सुख साथ साथ
लिए हैं!
इस चापलूसी में भारत के राजा, जमींदार, बड़े
सामंत और पूंजीपति अग्रणी रहे हैं. इन्ही के कारन भारत का बटवारा हो गया! कौंग्रेस
और मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों के बाद सत्ता मजदुर वर्ग के हाथ में नहीं देना चाहते
थे, जैसा भगत सिंह चाहते थे. अंग्रेजों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया और भारत को 2
टुकड़ों में बाँट दिया!
तो क्या चमचागिरी सारे भारतीय खून में नहीं है?
क्या यह ‘दासों’ या एक गरीब देश की मानसिकता नहीं है? क्या यह उनकी जरुरत है? क्या
देश के शोषक (जो देश के सारे प्राकृतिक सम्पदा के मालिक हैं और विदेशी पूंजी की मदद
चाहते हैं, इनका भरपूर फायदा लेने का, मुनाफा दर बढाने के लिए) के सामने नाक रगड़ना
जरुरी है?
गलत है. साधारण मजदुर और किसान, चाहे किसी भी
समुदाय के हों, जाति और धर्म के हों, विदेशी या देशी ताकतों की दलाली नहीं करते.
यह केवल आत्म सम्मान के लिए नहीं बल्कि इनकी ऐसी समझ ही नहीं है! ये, मेहनतकश
इंसान अपनी जरूरतों के लिए दिन रात परिश्रम करते हैं, मालिकों के लिए, और बचे हुए
समय में अपने परिवार के साथ बिताते हैं. इन्फौर्मेशन तकनिकी बढ़ने का बाद, कुछ
हिस्सा अवश्य समाज में बने वर्गीय सीढ़ी में ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, जो बिलकुल
स्वाभाविक है!
पूंजी की जरुरत है और अधिक मुनाफा, बेशुमार
मुनाफा. यह उसकी मज़बूरी भी है. यदि प्रतिस्पर्धा में हार गए तो, अपने ही
प्रतिद्वंदियों द्वारा निगल लिए जायेंगे! बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाति है! इस
भयानक मुनाफाखोरी में यह सीधे साधे मजदुर और किसान तबाह हो जाते है!
सामयिक और बार बार आने वाली आर्थिक मंदी भी
पूंजीवाद का उतना ही सत्य है, जितना दिन के बाद रात और फिर दिन का आना. पूंजीवाद
के सारे आर्थिक सलाहकार, विद्वान हार चुके हैं. यह कहानी 250 वर्षों से दुहरायी जा
रही है. अभी की आर्थिक मंदी, 2008 वाली का, असर तो आज भी दिख रहा है. बिना मंदी के
गए ही, यानी बिना आर्थिक उफान के ही अगले मंदी की आहट सुनाई दे रही है! अमेरिका और
पाश्यात्य देशों में मार्क्स की “पूंजी” की बिक्री बड़े ही धड़ल्ले से चल रहा है!!!
तो क्या यह भावना (चमचागिरी या चाटुकारिता) भी
इसी पूंजीवाद का हिस्सा है, जो पहले सामंतवाद में था? आधार क्या है? वर्ग विभाजित
समाज का उपज है यह! समाज वर्गों में क्यूँ विभाजित है? निजी पूंजी? जी हाँ, जिसके
कारण उतपादन के सारे साधन, मजदूरों के जीने के सारे साधन, देश की सारी सम्पदा कुछ
खास लोगों के हाथ में है. सरकार और इसकी सारे ‘खम्भे’ भी इसी के हाथ में है. क्या
आपको अभी के सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुना? कहा गया है की कोर्ट कोई भी ऐसा आदेश ना
दे जिससे पूंजीपतियों को घाटा हो!!!!!!!!!!!!
तो यह आधार है आदमी का आदमी के सामने झुकने का!
चाहे गुलाम व्यवस्था हो, या सामंती या पूंजीवादी, समाज का वर्ग विभाजन विवश करता
है, अपने श्रम शक्ति को बेचने के लिए और बिचारे शोषित विवष होते हैं अपने आपको
झुकाने के लिए, हालाँकि यह चमचागिरी से भिन्न है.
मध्य वर्गीय जनता, यानि पेट्टी बुर्जुआ (तकनिकी
रूप से एक नहीं है, इसपर अवश्य विचार करें) वर्ग तो बना ही है बुर्जुआ वर्ग की
चमचागिरी करने के लिए और मजदुर वर्ग से नफ़रत करने के लिए. खैर यही वर्ग, यानि
माध्यम वर्ग कहें तो चमचागिरी में महारथ हासिल करता है! छोटे पूंजीपति बड़ों की और
बड़े “और बड़े विदेशी पूंजीपति” वर्ग की चमचागिरी करता है! मुनाफा बढ़ाने के लिए!
क्या यह व्यवस्था अनंत समय के लिए है? बिलकुल
नहीं! कोई भी व्यवस्था अनंत काल के लिए नहीं है. हाँ, आज की व्यवस्था, जो अन्याय
पर आधारित है और गलत है, ख़त्म होगा पर अपने आप नहीं! वही मजदुर वर्ग, जिसके आधार
पर यह अरबों, खरबों का मुनाफा पूंजीपति वर्ग कमाता है, शोशन करने वाले वर्ग का जड़
खोदेगा!
तो चाटुकारिता ना तो खून में है यानि ना तो
हमारे जींस में है, नाही अनंत काल के लिए है, अजर अमर नहीं है. यह वर्ग विभाजित
समाज की देन है. सर्वहरा वर्ग उस ऐतिहासिक पड़ाव पर है, जो समाजवादी क्रांति के लिए
ही तैयार है. 1956 के बाद सोविअत रूस में पूंजीवाद का फिर से स्थापना दुनिया के
मजदूरों के लिए बहुत बड़ा झटका था! पर, अब स्थिति भिन्न है. महंगा सबक होने के
बावजूद, क्रांति की भभक महसूस किया जा रहा है!
क्रांति विरोधी शक्तियां एकजुट हैं और हर संभव
प्रयास कर रही हैं प्रतिक्रांति हवा को बनाये रखने के लिए! हालाँकि उनके एकजुटता
में भयानक विरोधाभास है, जो लुट में हिस्से के कारन है! अमेरिका, चीन, उक्रेन,
भारत, जर्मनी, आदि जगहों में दिख रहा है! जमीन और विचारों में हर जगह यह संघर्ष
दिख रहा है! भले ही प्रतिक्रांतिकारी शक्तियां आगे नजर आ रही हों, पर अंतर प्रवाह
बिलकुल उल्टा है!
समाजवादी क्रांति का बयार पुरे विश्व में प्रवाहित
हो रहा है. चाटुकारिता, पूंजीवादी उत्पादन का ही एक झलक है, जिसमे अन्धविश्वाश,
मूढ़ता, अवैज्ञानिक सोच है, क्रांति के दावानल में ही भस्म होगा, फिर भी हम शिक्षित,
अग्रणी और क्रन्तिकारी शक्तियों, खासकर युवाओं की कोशिश हमेशा होगी, इस कोढ़ को
ख़त्म करें, स्टडी सर्किल चलायें, क्रांति की तैयारी करे!
सर्वहारा वर्ग की चेतना, एकता और संघर्ष ही
रास्ता है एक वैज्ञानिक समाजवाद की: शोषित और प्रताड़ित दलित, जनजाति, महिला मजदुर,
बाल मजदुर, धार्मिक अल्पसंख्यक और सर्वहारा वर्ग के मुक्ति, बराबरी, भाईचारा के
लिए! चाटुकारिता छोडो, बगावत का झंडा ऊँचा करो, भगत सिंह के देश को चमचों और
मूर्खों के हवाले ना होने दो!
इन्कलाब ज़िन्दाबाद!
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