नेकई सर्वे के मार्च तक के लिए जारी रिपोर्ट भारत के निर्माण क्षेत्र की दयनीय बरकरार स्थिति की पुष्टि करने वाली साबित हो रही है। Nekkei India Manufacturing Purchasing Manager Index के अनुसार निर्माण क्षेत्र में पिछले 5 महीने में सबसे कम विकास की दर मापी गई। PMI के रेटिंग के अनुसार मार्च में वृद्धि दर 51.0 रहा जो के फरवरी माह के दर 52.1 से 1.1 पॉइंट काम था। निक्केई रेटिंग में 50 से ऊपर निर्माण क्षेत्र में विकास और इससे नीचे संकुचन को दर्शाता है।
जिस प्रकार से निर्माण क्षेत्र में गिरावट आ रही है यह जल्दी ही 50 पॉइंट के नीचे आ सकता है।
भारत के निर्माण क्षेत्र से आ रहे आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि अर्थव्यवस्था का संकट केवल वित्तीय क्षेत्र तक सीमित न रह कर अब हर क्षेत्र में फैलता जा रहा है।
निक्केई PMI और अन्य रेटिंग किस बात का इशारा कर रहे है?
*पहली बात तो यह कि देश की आर्थिक अवस्था दिनों दिन खराब होती जा रही है।
*निर्माण क्षेत्र पिछले वर्षों में ढलान पर है, और यह सिकुड़ता ही जा रहा है।
नोटबन्दी और जी.एस.टी का असर लघु, छोटे और काफी हद तक मध्यम दर्जे के निर्माताओं पर पड़े मार से अभी तक नहीं निकल सका है। इन दो कारण से काफी लागू, छोटे निर्माता ने अपने प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया।
बन्द हुई कंपनियों में काम कर रहे मज़दूर देश में पहले से ही व्याप्त बेरोजगारों की फौज में अच्छी खासी वृद्धि कर दी। और reserve army of labour की बड़ी खेप देश में तैयार हो गयी है।
रोज़गार के कम होते साधन और निर्माण क्षेत्र में लगातार संकट और सिकुड़न अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट और आने वाले मंदी (recession) की ओर इशारा कर रहे हैं।
2008 में वित्तीय मंदी से भारत कुछ हद तक अपने को अछूता बैंक और वित्तीय संस्थानों की सुदृढ़ स्थिति के कारण कर सका था और करीब 8 प्रतिशत के औसत दर से जीडीपी विकास भी रिकॉर्ड किया था।
लेकिन 2018 में हाल बिल्कुल उलटा है।
बैंकों की माली हालत नाज़ुक है। NPA की औसत में दिसंबर 2014 के मुकाबले दिसंबर 2016 में 135 प्रतिशत का उछाल आया है जो आज शायद और ज्यादा हो गया होगा (फिलहाल हमारे पास 2016 के ही आंकड़े उपलब्ध हैं)। 2017 में सरकारी बैंकों के डूबे ऋण (bad loan) का अनुपात उनकी कुल net value का करीब 75 प्रतिशत है। जो खुद में इन बैंकों की पतली हालात की तरफ साफ संकेत है।
देश पर आर्थिक मंदी के बादल मंडरा रहे हैं, मंदी को कितने दिनों तक दूर रखा जा सकता है, इस पर जिन्हें फैसले लेने हैं वे खुद ही चंद पूंजीपतियों को अकूत ऋण देकर देश की जनता को खाई में धकेल रहे हैं।
भगवान और धार्मिक उन्माद का नाम लेना सत्ता में रहने के लिए काफी हो, तब कोई फिर अर्थव्यवस्था की चिंता क्यूं करे?
(साथी दामोदर के फेसबुक के पोस्ट से.)
पूंजीवाद मतलब मूनाफे के लिए उत्पादन. पिचले वर्ष के सारे सामाजिक धन का 73% हिस्सा भारत के कुछ बड़े पूंजीपति हड़प कर ले गए! मतलब जीडीपी, जो भी हो, वह मजदूर वर्ग और किसान के पास नहीं जाता है. ऊपर से पूंजीवादी वर्ग भी इस पूंजीवादी उत्पादन के अन्दुरुनी अंतर्विरोध के कारन विकसित नहीं हो सकता है. यानि उत्पादक शक्तियों का ह्रास! इसी का नतीजा है, भारत में उत्पादन क्षमता का केवल 70% ही इस्तेमाल हो रहा है! अब, केवल एक ही रास्ता है मजदूर वर्ग और किसानों के पास, इस उत्पादन प्रणाली को हटाकर समाजवादी उत्पादन की व्यवस्था लायें. यानि, वह समाज जहाँ उत्पादन के साधन पर उत्पादन करने वालों के अधीन हो, उत्पाद के मालिक भी वही होंगे और वितरण उन्ही के हाथ में होगा!
जिस प्रकार से निर्माण क्षेत्र में गिरावट आ रही है यह जल्दी ही 50 पॉइंट के नीचे आ सकता है।
भारत के निर्माण क्षेत्र से आ रहे आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि अर्थव्यवस्था का संकट केवल वित्तीय क्षेत्र तक सीमित न रह कर अब हर क्षेत्र में फैलता जा रहा है।
निक्केई PMI और अन्य रेटिंग किस बात का इशारा कर रहे है?
*पहली बात तो यह कि देश की आर्थिक अवस्था दिनों दिन खराब होती जा रही है।
*निर्माण क्षेत्र पिछले वर्षों में ढलान पर है, और यह सिकुड़ता ही जा रहा है।
नोटबन्दी और जी.एस.टी का असर लघु, छोटे और काफी हद तक मध्यम दर्जे के निर्माताओं पर पड़े मार से अभी तक नहीं निकल सका है। इन दो कारण से काफी लागू, छोटे निर्माता ने अपने प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया।
बन्द हुई कंपनियों में काम कर रहे मज़दूर देश में पहले से ही व्याप्त बेरोजगारों की फौज में अच्छी खासी वृद्धि कर दी। और reserve army of labour की बड़ी खेप देश में तैयार हो गयी है।
रोज़गार के कम होते साधन और निर्माण क्षेत्र में लगातार संकट और सिकुड़न अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट और आने वाले मंदी (recession) की ओर इशारा कर रहे हैं।
2008 में वित्तीय मंदी से भारत कुछ हद तक अपने को अछूता बैंक और वित्तीय संस्थानों की सुदृढ़ स्थिति के कारण कर सका था और करीब 8 प्रतिशत के औसत दर से जीडीपी विकास भी रिकॉर्ड किया था।
लेकिन 2018 में हाल बिल्कुल उलटा है।
बैंकों की माली हालत नाज़ुक है। NPA की औसत में दिसंबर 2014 के मुकाबले दिसंबर 2016 में 135 प्रतिशत का उछाल आया है जो आज शायद और ज्यादा हो गया होगा (फिलहाल हमारे पास 2016 के ही आंकड़े उपलब्ध हैं)। 2017 में सरकारी बैंकों के डूबे ऋण (bad loan) का अनुपात उनकी कुल net value का करीब 75 प्रतिशत है। जो खुद में इन बैंकों की पतली हालात की तरफ साफ संकेत है।
देश पर आर्थिक मंदी के बादल मंडरा रहे हैं, मंदी को कितने दिनों तक दूर रखा जा सकता है, इस पर जिन्हें फैसले लेने हैं वे खुद ही चंद पूंजीपतियों को अकूत ऋण देकर देश की जनता को खाई में धकेल रहे हैं।
भगवान और धार्मिक उन्माद का नाम लेना सत्ता में रहने के लिए काफी हो, तब कोई फिर अर्थव्यवस्था की चिंता क्यूं करे?
(साथी दामोदर के फेसबुक के पोस्ट से.)
पूंजीवाद मतलब मूनाफे के लिए उत्पादन. पिचले वर्ष के सारे सामाजिक धन का 73% हिस्सा भारत के कुछ बड़े पूंजीपति हड़प कर ले गए! मतलब जीडीपी, जो भी हो, वह मजदूर वर्ग और किसान के पास नहीं जाता है. ऊपर से पूंजीवादी वर्ग भी इस पूंजीवादी उत्पादन के अन्दुरुनी अंतर्विरोध के कारन विकसित नहीं हो सकता है. यानि उत्पादक शक्तियों का ह्रास! इसी का नतीजा है, भारत में उत्पादन क्षमता का केवल 70% ही इस्तेमाल हो रहा है! अब, केवल एक ही रास्ता है मजदूर वर्ग और किसानों के पास, इस उत्पादन प्रणाली को हटाकर समाजवादी उत्पादन की व्यवस्था लायें. यानि, वह समाज जहाँ उत्पादन के साधन पर उत्पादन करने वालों के अधीन हो, उत्पाद के मालिक भी वही होंगे और वितरण उन्ही के हाथ में होगा!
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