"और कितना शोषण होगा?", "जुल्मी एक ना एक दिन थक ही जायेगा", "इंकलाब होगा जब इन्तहा होगा", आदि! साथियों, इस बात से तय नहीं होता कि मालिक का पेट कब भरेगा! वह कभी भी नहीं भरेगा. ड्रैकुला है, जितना ही नर लहू पिएगा, उतना ही उसे और चाहिए!
बल्कि इस बात से कि शोषित जनता कितना विरोध करती है इस शोषण का, कितनी क्षमता रखती है शोषितों को परस्त करने का!
भाजपा सरकार के आने के बाद जनता का शोषण बेतहाशा बढ़ा है, क्यूंकि जनता का कुछ हिस्सा शोषण कर्ताओं के जाल में फंस चुकी है. देश, धर्म, जाति के नाम पर वे उन्हीं चिल्हों और गिद्धों का साथ दे रहे हैं जो इन्तेजार कर रहे हैं कि कब ये "मुर्ख" मरें और वो इनके मांस को नोच नोच कर खाएं और महा भोज का आयोजन करें! मध्यमवर्गीय "सियार" तो हमेशा से ही बड़े पूंजीपतियों का चापलूस रहा है, भले ही बीच बीच में नाराज हो जाता है, जबकि मालिक का डंडा उसपर भी पड़ता है!
हम विभाजित हैं. हमारे पक्ष में जो भी कुछ श्रम कानून थे, तक़रीबन 40-45 ख़त्म कर दिए गए, रोजगार ख़त्म किये जा रहे हैं, किसानों और आदिवासियों के जमीन हड़पने के नियम सरल किये जा हैं, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के आदेश पर आधार कार्ड अनिवार्य बनाये जा रहे हैं, एफडीआई 100% तक लागु किये गए, हमारे व्यक्तिगत डाटा अमेरिकी, नाटो, इसरायली ख़ुफ़िया विभाग सौपें गए, अमेरिकी सैन्य को हमारे सैनिक अड्डों का निरिक्षण करने के अधिकार दिए गए, आदि आदि!
और भी हमारे पीछे क्या किये गए, हमें नहीं मालूम. जीवन दूभर हो गया है. किसानों, मजदूरों, खासकर असंगठित क्षेत्रों में 2 जून की रोटी भी नहीं कमा सकते. बेरोजगारी और गरीबी के डाटा भी अब आने बंद कर दिए गए हैं!
(जी हाँ, यही तो फासीवाद है, पूंजीवाद का बेहद ही सडा गला और अहिंसक रूप है! हमारी एकता के ख़त्म होने और पूंजी के अन्दुरुनी अंतर्द्वन्द के बढ़ने से यह स्थिति पहुंची है. समाधान भी हमारी एकता और क्रन्तिकारी संघर्ष ही है, जब हम फासीवाद ही नहीं, इसकी जननी पूंजीवाद को ही ख़त्म कर दें!)
क्या हम अपने वर्गीय हित को पहचान सकते हैं, जो मालिकों के वर्गीय हितों के विरोध में है. मालिक को ज्यादा से ज्यदा मुनाफा चाहिए, जबकि हमें एक ढंग का रोजगार और जीने का साधन. ये दोनों आपस में शत्रुता पूर्ण सम्बन्ध रखते हैं.
जागो साथियों, अपने मजदूर वर्ग को पहचानो और एक क्रन्तिकारी एकता की तरफ बढ़ो! वैज्ञानिक समाजवाद ही हमारा अगला पड़ाव है. रुकना नहीं है, जबतक की लक्ष्य की प्राप्ति ना हो!
इंकलाब जिंदाबाद!
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