मोदी सरकार की छत्रछाया में बड़े आराम से बड़े पूँजीपति वर्ग की मुनाफाखोरी लील चुकी है नौजवानों-मज़दूरों और मेहनतकशों की नौकरियाँ!
R B I की एक हालिया रिपोर्ट के हवाले से यह कहा गया है कि मोदी सरकार के कार्यकल में देश में रोजगार वृद्धि दर यानी एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ रेट 2014-15 में 0.2% और 2015-16 में 0.1% रहा है। इसमें 2017-18 की चर्चा भी होती तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती। हम जानते हैं, आज रोजगार सृजित नहीं, नष्ट किये जा रहे हैं। इसलिये आज रोजगार सृजन की बढ़ी हुई नहीं, घटी है. इस सच्चाई की ज्यादा से ज्यादा चर्चा, इस एक बड़ी सच्चाई को सामने लाने को लेकर होनी चाहिये कि आज रोजगार नष्ट किये जा रहे हैं।
यही नहीं पूरी आधुनिक सभ्यता नष्ट की जा रही है। विनाश का मंज़र हर कहीं दिखता है। खैर.....यह जानकर आैर अधिक आश्चर्य होगा कि 2014-15 और 2015-16 के बारे में इंगित यह घटी हुई रोजगार वृद्धि दर वास्तव में कितनी घटी हुई है। यह 1982 के बाद सबसे ज़्यादा घटी हुई रोजगार वृद्धि दर है! तो ऐसे में नौकरी कहाँ से मिलेगी नौजवानों को!?
पूँजीवाद अब लोगों की जीवन यापन सम्बन्धी पारंपरिक सुरक्षा को भी हमेशा के लिए संकट में डाल चुकी है। यह उसकी मुख्य प्रवृत्ति है जिसका नग्न स्वरूप आज हम मोदी राज में देख रहे हैं। मोदी सरकार इसके लिए धन्यवाद की पात्र है कि इसके खुले पूंजीपरस्त करतूतों ने लाखों-करोड़ों युवाओं को यह सीखने का अवसर दिया है कि पूँजीवाद अधिकतम मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति से लैस किस आदमखोर और राक्षसी व्यवस्था का नाम है। अगर युवा यह सीख और समझ रहे है तो कल इससे लोहा लेने के लिए भी आगे आएंगे यह निश्चित है। अब पूँजीवाद को हटाने और इसकी जगह नयी व्यवस्था के लिए सीधी लड़ाई का वक्त आ चुका है।
आइये, हम उसके आगमन का जमकर स्वागत करें। यह स्वागत एकमात्र इसी तरह हो सकता है कि हम स्वयं इस लड़ाई के हिस्सेदार बनें। इसकी शुरुआत हर गांव, कस्बा, शहर,मोहल्ले से करें। यह लड़ाई हमारी तरफ से हर प्रकार से खुला है, शर्त बस इतनी है कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सबों के लिये सुलभ हो, उपलब्ध हो, इसकी सच मे गारंटी की जाए। अगर इस व्यवस्था में नहीं तो, फिर जिस व्यवस्था में यह सम्भव है हम उसके लिए भी तैयार हैं। और तैयार रहना चाहिए। पूँजीवाद और पूँजीवादी शासन का मूल आदमखोर चरित्र अगर नहीं बदल सकता है, अगर यह समाज की प्रगति और समष्ट मानवजाति की उन्नति में और कोई योगदान नहीं दे सकता है, क्योंकि यह अधिकतम मुनाफाखोरी के लाइलाज क्षय रोग से पीड़ित है, तो इसे मृत्युशैया से उठाकर इसे कब्र में दफनाना ही उचित है।
यह युवाओं और योग्य से योग्य लोगों तक का रोजगार छीन रहा है, गुणवत्तापूर्ण की बात कौन करे सामान्य शिक्षा से वंचित कर रहा है, स्वास्थ्य सेवा को भी भयंकर मुनाफाखोरी के धंधे में बदल दिया है, यह करोड़ों-करोड़ जरूरतमंदों को घर और दो जून की रोटी तक मुहैया कराने में सक्षम नहीं हो रहा है, तो यह स्पष्ट है कि यह मरनासन्न है, सड़ चुका है, सड़े हुए लाश की तरह बदबूदार दुर्गंध फैला रहा है। इसे नष्ट कर देना और नई व्यवस्था का सृजन करना हमारे युग की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बन चुकी है।
आइये, मज़दूर भाइयों, मेहनतकश साथियों, छात्रों-नौजवानों! हम अपने इस ऐतिहासिक मिशन के लिए कमर कसें।
R B I की एक हालिया रिपोर्ट के हवाले से यह कहा गया है कि मोदी सरकार के कार्यकल में देश में रोजगार वृद्धि दर यानी एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ रेट 2014-15 में 0.2% और 2015-16 में 0.1% रहा है। इसमें 2017-18 की चर्चा भी होती तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती। हम जानते हैं, आज रोजगार सृजित नहीं, नष्ट किये जा रहे हैं। इसलिये आज रोजगार सृजन की बढ़ी हुई नहीं, घटी है. इस सच्चाई की ज्यादा से ज्यादा चर्चा, इस एक बड़ी सच्चाई को सामने लाने को लेकर होनी चाहिये कि आज रोजगार नष्ट किये जा रहे हैं।
यही नहीं पूरी आधुनिक सभ्यता नष्ट की जा रही है। विनाश का मंज़र हर कहीं दिखता है। खैर.....यह जानकर आैर अधिक आश्चर्य होगा कि 2014-15 और 2015-16 के बारे में इंगित यह घटी हुई रोजगार वृद्धि दर वास्तव में कितनी घटी हुई है। यह 1982 के बाद सबसे ज़्यादा घटी हुई रोजगार वृद्धि दर है! तो ऐसे में नौकरी कहाँ से मिलेगी नौजवानों को!?
पूँजीवाद अब लोगों की जीवन यापन सम्बन्धी पारंपरिक सुरक्षा को भी हमेशा के लिए संकट में डाल चुकी है। यह उसकी मुख्य प्रवृत्ति है जिसका नग्न स्वरूप आज हम मोदी राज में देख रहे हैं। मोदी सरकार इसके लिए धन्यवाद की पात्र है कि इसके खुले पूंजीपरस्त करतूतों ने लाखों-करोड़ों युवाओं को यह सीखने का अवसर दिया है कि पूँजीवाद अधिकतम मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति से लैस किस आदमखोर और राक्षसी व्यवस्था का नाम है। अगर युवा यह सीख और समझ रहे है तो कल इससे लोहा लेने के लिए भी आगे आएंगे यह निश्चित है। अब पूँजीवाद को हटाने और इसकी जगह नयी व्यवस्था के लिए सीधी लड़ाई का वक्त आ चुका है।
आइये, हम उसके आगमन का जमकर स्वागत करें। यह स्वागत एकमात्र इसी तरह हो सकता है कि हम स्वयं इस लड़ाई के हिस्सेदार बनें। इसकी शुरुआत हर गांव, कस्बा, शहर,मोहल्ले से करें। यह लड़ाई हमारी तरफ से हर प्रकार से खुला है, शर्त बस इतनी है कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सबों के लिये सुलभ हो, उपलब्ध हो, इसकी सच मे गारंटी की जाए। अगर इस व्यवस्था में नहीं तो, फिर जिस व्यवस्था में यह सम्भव है हम उसके लिए भी तैयार हैं। और तैयार रहना चाहिए। पूँजीवाद और पूँजीवादी शासन का मूल आदमखोर चरित्र अगर नहीं बदल सकता है, अगर यह समाज की प्रगति और समष्ट मानवजाति की उन्नति में और कोई योगदान नहीं दे सकता है, क्योंकि यह अधिकतम मुनाफाखोरी के लाइलाज क्षय रोग से पीड़ित है, तो इसे मृत्युशैया से उठाकर इसे कब्र में दफनाना ही उचित है।
यह युवाओं और योग्य से योग्य लोगों तक का रोजगार छीन रहा है, गुणवत्तापूर्ण की बात कौन करे सामान्य शिक्षा से वंचित कर रहा है, स्वास्थ्य सेवा को भी भयंकर मुनाफाखोरी के धंधे में बदल दिया है, यह करोड़ों-करोड़ जरूरतमंदों को घर और दो जून की रोटी तक मुहैया कराने में सक्षम नहीं हो रहा है, तो यह स्पष्ट है कि यह मरनासन्न है, सड़ चुका है, सड़े हुए लाश की तरह बदबूदार दुर्गंध फैला रहा है। इसे नष्ट कर देना और नई व्यवस्था का सृजन करना हमारे युग की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बन चुकी है।
आइये, मज़दूर भाइयों, मेहनतकश साथियों, छात्रों-नौजवानों! हम अपने इस ऐतिहासिक मिशन के लिए कमर कसें।
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